7/18/2009
चिट्ठकारी की दुकान चलाना हर किसी के बस में नही
7/08/2009
ब्लॉंगवाणी को लेकर इतनी टेंशन क्यो ? मेरे ब्लाग को हटाने से मुझे आपत्ति नही।
थोड़ा पोस्ट के विडियों पर भी लिखना चाहूँगा, यह विडियों यूट्यूब पर April 03, 2009 को डाला गया है। अभी तक यह विडियों विद्यमान है आर्थात यूट्यब द्वारा अश्लीलता या अशिष्टता की श्रेणी में नही है, अगर यह जब भी यूट्यूब समूह द्वारा यूट्यूब पर द्वारा हटाया जायेगा स्वत: ही मेरे ब्लाग से हट जायेगा। इस विडियों में गाली थी, जिसकी सूचना मैने अपने पोस्ट में कर दी थी। बहुत से पाठक/दर्शक आये, ब्लाग पोस्ट को देखा, आनंद लिया, कुछ ने पंसद किया और टिप्पणी करना उचित न समझ कर चले गये। मैने इस पोस्ट को मर्यादा के दायर में रख कर तैयार किया था, चेतवनी भी लिख थी कि टाईम लॉस के नाम कोई अनैच्छिक साम्रगी न देख ले, और उसे ग्लानि का एहसास हो, अगर आप चेतवनी के बाद देखते है और अन्य लोगो के मध्य देखने को प्रचारित करते है तो आपकी गलती है।
ब्लागवाणी को लगता है जन भावना के आधार पर मेरी उस पोस्ट जो टाईम लॉस पर आई थी के कारण ब्लागवाणी से हटाने योग्य है तो हटा दिया जाये, मुझे कोई आपत्ति नही है। क्योकि जन भावना को ध्यान में रखकर किये गये कार्य में मुझे क्या आपत्ति होगी। ब्लागवाणी के अनुसार करीब 35 लोगों द्वारा यह पोस्ट पढ़ी करीब 10 लोगो द्वारा पंसद की गई। (लेख लिखे जाने तक) जहाँ तक ब्लागवाणी को हिन्दूवाणी और संघवाणी के नामकरण का सम्बन्ध है तो यह काम ब्लागवाणी के संचालको का है, वो इतने समर्थवान है कि सब कर सकते है, किसी के अनुशंशा की आवाश्यकता नही है। अब कोई इस बात पर अड़ा रहे कि इनकी गंदगी ब्लागवाणी पर आयी मेरी नही तो यह कहना गलत बात है। वो पोस्ट कोई गंदगी न होकर क्रिकेटिया खिलाडियों के बीच की बात था, जो सच था और सब न मैच मै लाईव देखा रहा होगा, किन्तु आज इतना ज्यादा हुआ है किसी ओठ की भाषा को पढ़ पाने वाले जानकार ने अपने शब्द भर दिये है, इन महाशय को यह बुरा लग रहा है।
रही ब्लाग बात ब्लाग को फ्लैग करने की तो झंड़ा इसीलिये लिये लगाया जाता है, ताकि शोककाल में उसे झुकाया जा सके है, मेरे उक्त ब्लाग से जिसे शोक हो आराम से झंड़ा लहराये मुझे कोई दिक्कत नही है। आगे भी अच्छी-खराब (कोशिश होगी कि ज्यादा से ज्यादा अच्छी ही हो किन्तु क्रिकेटर जैसे क्रिकेट प्रेमियों के भगवान ऐसा अवतार) बाते आपके सामने लाता रहूँगा।
7/01/2009
लुघु पोस्ट - हो गये चिट्ठाकारी को तीन साल
आज चिट्ठाकारी में मुझे 3 साल पूरे हो गये, चौथे साल में प्रवेश कर रहा हूँ। तब से अब तक में बहुत कुछ बदल गया, सबसे ज्यादा सक्रियता। एक समय ऐसा था कि 2007 August ही अकेले 32 पोस्टे हुई थी, आज की गति ये है कि आधा साल बीतने को है 34 पोस्ट ही लिख पाया हूँ। आत्मसंतोष की घंटी बजा सकता हूँ कि आज-तक चिट्ठाकारी जारी है। ब्लाग के आर्चीव 2009 (34), 2008 (114), 2007 (152) व 2006 (28)पोस्टों के साथ चार साल के दर्शन कर भविष्य में चिटठकारी के लाईफ टाईम अचीवमेन्ट की दौड़ में आगे बने रहने ख्वाब पाल सकता हूँ। :)
आज बहुत ज्यादा लिखने का इरादा नही है, लघु पोस्ट से ही काम चला लीजिए। जल्द ही मिलूँगा, आप सभी के स्नेह व प्रोत्साहन लिये धन्यवाद। चूकिं यह पोस्ट कल ही आनी थी, 30 जून को ही मैने चिट्ठाकारी प्रारम्भ की थी, किन्तु कल का दिन व्यस्तता भरा होने के कारण पोस्ट नही कर सका।
6/26/2009
अंतर्राष्ट्रीय सदमा
विश्व के ख्यातिलब्ध पॉप गायक माईकल जैक्सन की 50 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। माईकल अपने जीवन काल में हमेंशा चर्चित रहे, भले ही बुराईयो ने उनका साथ न छोड़ा हो किन्तु अपनी प्रसशको समक्ष भगवान से कम नही थे। इस गायक की मौत की खबर पढ़कर वकई मै भी हतप्रभ हूँ और ईश्वर से आत्मा की शान्ति प्रार्थना करता हूँ।
माइकल जैक्सन ने अपना संगीत करियर अपने परिवार के पॉप ग्रुप द जैक्सन फ़ाइव के साथ शुरू किया था। 1982 में रिलीज़ हुआ उनका संगीत अलबम थ्रिलर अब तक का सबसे ज़्यादा बिकने वाले अलबम है। माइकल जैक्सन ने ब्रिटेन में भी कई बेहतरीन संगीत अलबम बनाए थे और 13 ग्रैमी अवार्ड्स भी जीते थे। अपने कैरियर मे बच्चो के साथ शारीरिक शोषण के मामले में दोषी भी पाये गये थे। विवादो में बीच में वो ऐस शक्स था जो विश्व के संगीत पटल पर हमेशा छाया रहा। आपके समक्ष माईकल का ही मर्म स्पर्शी गीत Heel the world रख रहा हूँ जो मुझे भी बहुत अच्छा लगता है और अगर मै माईकल को पंसद करता हूं तो सिर्फ Michael Jackson के गीत Heel the world के कारण ही।
इस गाने के सुनते समय मेरे आँखे में आँसू है, पता नही क्यो ?
6/25/2009
क्या चाय की दुकान खोलना हीन काम है?
आज के जनमत के साथ फिर हाजिर हूँ, आज का प्रश्न है कि - क्या चाय की दुकान खोलना हीन काम है? इस प्रश्न के पक्ष और विपक्ष में काफी नोकझोक रही। अपनी टिप्पणी के द्वारा हीन काम कहने वाले भी पीछे नही रहे तो अपनी तार्किक बात से काम को सही ठहराने वाले भी कम नही थे।
उपरोक्त जनमत से यही लग रहा है कि 89% लोग इसे गलत नही माते है, और करीब 13% इसे गलत मानते है। चाय को गलत काम मान कर प्रथम व्यक्ति कहते है - मुझे नही लगता मेरे भाई की आपको कोई भी जवाब यंहा ग़लत मिलेगा लेकिन मेरा जहाँ तक मानना है आप अच्छे विद्वान व्यक्ति है और आप जो निर्णय लोगे सोच विचार के ही लोगे- लेकिन भाई जी आपने ये नही सोचा की आप एक उस आदमी के रोज़गार का हनन कर रहे है जो वाकई केवल ये कर सकता है आप तो फिर भी कोई अन्य कार्य कर सकते है लेकिन जो जरूरतमद है वो ही ये कार्य करे तो शोभा देता है आप अपने शौक के लिए अगर के कर रहे है तो में नही समझता की चाय की दुकान खोलना अच्छा है। कोई भी कम कम छोटा या बड़ा नही है ये हम सब जानते है लेकिन जो सोच विचार कर किया जाए वही उचित है।
द्वितीय व्यक्ति कहते है - दिल से सोचो तो नही और दिमाग से सोचो तो हाँ
तथा 87% में कुछ ऐसे भी मतदाता थे तो अपनी बातें रखे थे, प्रथम व्यक्ति कहते है - यदि आप आलस के कारण, एक आसान काम समझ कर चाय की दुकान खोल रहे हैं तो यह गलत होगा। यदि तमाम दिक्कतों और कमियों के बाद भी हम एक बडा लक्ष्य सामने रख कर चाय की दुकान खोलते हैं तो फिर शर्म कैसी? याद रहे हमारा लक्ष्य और सपने बडे होने जरूरी हैं।
द्वितीय व्यक्ति कहते है - Chai ke sath Coffie bhi honi chayiye aur cold drink bhi, Kaam koi bhi chota Bada nahi hota, AAj ki sab badi industries Kal bahut choti si dukany hi thi, Aaj cahi ki dukan , 30 Saal baad Hotal chain mai badal jaye.
आप क्या मानते है ?
पिछला जनमत :- 85% लोगो को नही पता है भारत के प्रधानमंत्री पद धारण करने की न्यूनतम आयु
6/24/2009
सरकार तो है सबकी माई-बाप पर सगी तो है नही
उत्तर प्रदेश के महाविद्या लयों में जींस को लेकर शासन की राय आ ही गई, शासन की ओर से कहा गया कि युवतियों को कालेज में जींस पहनने से कोई रोक नही है। सरकार की ओर से आई यह राय निश्चित रूप से गलत कदम है, क्योकि शिक्षण संस्थान में मर्यादा की आवाश्यकता होती है न कि देह प्रदर्शन की। आज के दौर में शिक्षण संस्थान पड़ाई के कम प्रेम प्रपंचों के अड्डे भर बन कर रहे गये है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज्ञान संकाय अक्सर युवक और युवतियों के जोड़ो का जमघट बना रहता है, कभी प्रक्टर के छापे की खबर से ये जोड़े भागे डगर नही पाते है, आखिर क्यो ऐसी स्थिति आती है? जब आपको लगता है कि आप गलत नही कर रहे हो तो प्रक्टर के आने पर भाग कर क्यो गलत बन जाते हो। इसका साफ कारण है कि इन्हे पता होता है कि यह शिक्षा की स्थली है न प्रेमाश्रय, इन्हे डर होता है कि पकड़े जाते पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होगी और पढ़ाई का कैरियर खराब हो जायेगा। आखिरकार तय है कि अनुशासन के डन्डे से ये जोड़े भाई-बहन भी बनने को तैयार हो जाते है, अर्थात सईया को भैया बनने में देर नही लगती है।
जींस को लेकर कालेज प्रशासन का रवैया बिल्कुल जायज है, क्योकि जींस में न सिर्फ लडकिया असुरक्षित होती है बल्कि सबसे ज्यादा छींटाकशी इन्ही पर की जाती है। आज दस साल पहले जींस का इतना क्रेज नही था, आज हो गया है, कल को मिनी स्कर्ट और बिकनी का क्रेज होना तय है तो क्या ये भविष्य के विद्यालयी परिधान माना जा सकता है। अभी दैनिक भास्कर को पढ़ रहा था, प्रधानाचार्य परिषद के इस फैसले को देशी तालीबानी फैसला कह कर न्यूज़ प्रकाशित की थी, अगर मीडिया को महिलाओं को खुलेपन हिमायती है तो क्यो नही मुस्लिमो के बुरके के विरोध में आती? विरोध नही कर सकते, कारण है कि मुस्लिम मीडिया की अडम्बरी ताकत के महाल को एक पल नेस्तानाबूत कर देगें।
मेरा यह मानना है कि महिलाओं के लिये ही नही पुरूषों के लिये भी विभिन्न संस्थानों में सामान्य वेश भूषा के नियम होने चाहिये। पुरूषों को भी ऐसे वस्त धारण करने की अनुमति नही दी जानी चाहिये वह अश्लील श्रेणी में आते हो। जब आफिस- कार्यालय में आप ड्रेस कोड से बंधे हुये हो तो शिक्षण संस्थान में क्यो नही ? शिक्षण संस्थान को रैंप नही जो अंग प्रदर्शन की जगह बनाई जाये। आज जीन्स के लिये प्रदर्शन हो रहे है, कल को शॉट जिंस, ब्रा-बिकनी के लिये होगे।
गौर तलब हो कि हर समर्थन करने वाला, कम से कम अपने घर की महिलाओं को इस ऐसे वस्त्रो में देखना पंसद नही करता है। मगर विरोध प्रदर्शन और मानवाधिकार की दुहाई में सबसे आगे दिखते है, जरूरी है अपनी रोटी जो सेकनी होती है। सरकार तो है सबकी माई-बाप पर सगी तो है नही, जो पहनाये पहन लो। :)
6/23/2009
क्या है ऐस !
मेरी पिछली पोस्ट एक मैच में सर्वाधिक ऐस, फिर भी न जीती रेस पर मेरे शहर के ही वीनस केसरी जी ने ऐस (Ace) के बारे में जानने की इच्छा जाहिर की थी। जैसा कि पिछली पोस्ट में मैने लिखा था कि क्रोशियाई खिलाड़ी इवो कार्लोविक ने एक मैच में सर्वाधिक ऐस जामये थे।ऐस को समझने से पहले टेनिस के अंक प्रणाली को समझाना होगा, किसी गेम का 1 अंक प्राप्त करने के लिये किसी खिलाड़ी को (15-0, 30-0, 40-0 के एक गेम प्वाईंट और अर्जित करना होता है) तब किसी खिलाड़ी को 1 अंक प्राप्त होता है। ऐसे ही 6 अंक प्राप्त करने पर कोई खिलाड़ी 6-0 या 6- 2 या 6-3 से एक सेट जीतता है। इस प्रकार खिलाड़ी को पहले सेट जीत के साथ बढ़त मिल जाती है। दूसर, तीसरा और जरूरत पढ़ने पर चौथा व पाँचवा सेट खेला जाता है।
अब मैं 55 ऐस को इन अंको में रखूँगा पहले ऐस से खिलाड़ी को 15, दूसरे से 30, तीसरे से 40 और चौथे ऐस से खिलाड़ी 1 मैच प्वाईनट हासिल कर लेगा। इस प्रकार 55 ऐसे कुल इस तरह करीब 14 सेट प्वाइंट मिलेगे, और इस14 सेट प्वाइंट से सिर्फ ऐस के द्वारा खिलाडी़ कुल 3 सेटों के मैच को 6-0, 6-0 से जीत सकता है और 5 सेटों के मैंच में 6-0,6-0,2-0 से आगे होगा।
क्या होता है - ऐस
ऐस खिलाड़ी के सर्विस(जब एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी की ओर गेंद मारता है) दौरान पाया जाता है, इसे प्रथम खिलाड़ी द्वारा गेंद मारे जाने पर विरोधी खिलाड़ी गेंद को नही मार( सर्विस करने वाले खिलाड़ी की ओर ) पाता है तो कह की ऐस लग गया। वर्तमान में विम्बड़न चल रहा है आप असानी से ऐस को देख सकते है। ऐस खिलाड़ी की सर्विस क्षमता और चपलता को दर्शाता है।
निम्न वीडियों में आप ऐस को बाखूबी से देख सकते है -
चित्र साभार- सर्विस करते चारो ग्रैन्डस्लैम विजेता रोजर फेडरर
6/22/2009
एक मैच में सर्वाधिक ऐस, फिर भी न जीती रेस
विम्बलडन (Wimbledon) का महासमर आज से शुरू हो रहा है। नाडाल के हटने के बाद सबकी निगाहें अब विम्बलडन के सरताज रोजर फेडरर पर ही रहेगी। आज टेनिस (Tennis) के बारें में पढ़ रहा था तो एक बहुत ही रोचक तथ्य सामने आया मै पढ़ और देख दोनो श्रेणियों से दंग था। आज मै क्रोशिया के इवो कार्लोविक (Ivo Karlovic) के बारें में पढ़ रहा था। यह दुनिया का एक मात्र पहला खिलाड़ी है जिसने किसी मैंच में 50 से अधिक ऐश (Ace) लगाये है और यह कारनामा यह दो बार कर चुके है किन्तु र्दुभाग्य है कि दोनो ही मैचों में इस खिलाड़ी को हार का समाना करना पड़ा था।
इवो कार्लोविक ने 2009 के रोलैंड गर्रोस (Roland Garros) के कोर्ट पर पहले राउन्ड में आस्ट्रेलिया के लिटेन हेविट (Lleyton Hewitt) के खिलाफ 5 सेटों के मुकाबले में 55 ऐश जमाये थे जबकि पहली बार 2005 बिम्बल्डन के कोर्ट पर 51 ऐश लगा चुके है। इसे इत्फाक कहे गया दुर्भाग्य कि दोनो ही मैंचो में इस क्रोशियाई खिलाड़ी को पराजय का समाना करना पड़ा। इवो कार्लोविक एक जुझारू खिलाड़ी है जो कुछ ही दिन ही पूर्व रोजर फेडरर (Roger Federer) को हरा चुके है।
इवो कार्लोविक एक सामान्य सा खिलाड़ी कोई बड़ी उपलब्धि नही किन्तु किसी पूर्व नम्बर एक खिलाड़ी के विरूद्ध 54 ऐश वकई मेरी नज़र में तो एक बड़ी उपलब्धी तो है। वर्तमान विम्बडन में 22वीं वरीयता प्राप्त इवो कार्लोविक से काफी चमत्कार की आशा की जा सकती है, अगर फिर से 50 से ज्यादा ऐश एक ही मैच में देखने को मिले तो वकाई एक अनोखा मैंच होगा।
6/17/2009
85% लोगो को नही पता है भारत के प्रधानमंत्री पद धारण करने की न्यूनतम आयु

स्पष्ट हो कि सांसद होने की पात्रता रखने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है, और भारत के सन्दर्भ में एक लोक सभा के सांसद होने के लिये 25 वर्ष निर्धारित की गई है तथा राज्य सभा में यह 30 वर्ष है। प्रधानमंत्री हमेंशा जनता के सदन लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होता है, इस कारण 25 वर्ष का व्यक्ति प्रधानमंत्री नियुक्त हो सकता है।
6/12/2009
घुना हुआ ''तीसरा खम्भा''
विधि पर चर्चा करना बहुत ही गम्भीर मसला है, खास कर विधिवालो पर करना उससें भी गम्भीर। यह मै नही पिछले कुछ दिनों में हिन्दी चिट्टाकारी में घटे वाक्यें ये कहते है। हमारे अरूण जी को एक मेल मिलता है, वे डर से या किसी और कारण अपनी ब्लाग पोस्ट का वध कर देते है। उक्त पोस्ट के वध के कारणों की व्यख्या करते हुये स्वयं अरूण जी ने नये पोस्ट को भी लेकर आते है।
उनकी हटाई गयी पोस्ट को मैने कई बार गम्भीरता पूर्वक पढ़ा, मनन और विचार मंथन भी किया, किसी सीरे से वह पोस्ट ऐसी प्रतीत हो रहा था कि वह किसी समुदाय विशेष के लिये तो लिखी गई है किन्तु कोई आहत होगा, ऐसा तो मुझे नही ही लगा। मै ऐसा इसलिये कह रहा हूँ, कि मेरा परिवार स्वयं विधि से 35 वर्षो से जुड़ा हुआ है, और मै स्वयं 21 वर्ष से विधि के सानिध्य में पल-बढ़ रहा हूँ तथा गत 2 वर्षो से विधि का अध्ययन कर रहा हूँ, और एशिया के सबसे बड़े उच्च न्यायलय के शहर से जुड़े होने के नाते, कुछ महत्वपूर्ण फैसलो पर अध्ययन व लेखन भी करता रहता हूँ, विधि के एक छात्र होने के तौर पर। जब इस प्रकार के कुछ मुद्दे घटित होते है तो निश्चित रूप से प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाना स्वाभाविक होता है, जैसा आपने विभिन्न ब्लागों पर आप लोगो ने देखा ही होगा। मै पुन: मूल विषय पर आना चाहूँगा वह यह है कि क्या वह लेख अधिवक्ता समाज के लिये अपामान जनक है/था ? इस पर मै कुछ बात रखना चाहूँगा।
- सर्वप्रथम भारतीय फिल्मो को लूँगा, कहा जाता है कि फिल्में समाज की दर्पण होती है, सर्वप्रथम फिल्मों में वकील को किस किस रूप में नही दिखाया जाता है। भारत में लगभग 30 प्रतिशत फिल्मो में वकीलो का महत्वपूर्ण किरदार होता है, फिल्मों में दिखाया ज्यादातर वकील उच्चके, मक्कर, धूर्त, अश्लीलता भरे प्रश्न पूछने वाले, रिश्वत खोर, गुन्डो के सहयोगी, बलातकार के आरोपी का मददगार तथा भिन्न भिन्न रूपों में दिखाया जाता है। इन दृश्यों से वकील समुदाय की छवि नही खराब होती है? या यह सब वास्तविकता है जो वकील समुदाय चुप हो कर स्वीकार करता है। यहां तक की भारतीय न्यायलय व न्याधीशों की स्थिति को भी नकारात्मक दिखाने का प्रयास किया जाता है।
- ज्यादातर फिल्मों में जो उपर वकीलो के लिये लिखा हूँ, उसी छवि को दिखाने के लिये नेता, पुलिस तथा डाक्टर आदि के लिये भी किया किया जाता है। फिल्मो में साफ तौर पर दिखाया जाता है कि खास तौर पर महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री कुर्सी बचाने के लिये व गृहमंत्री सीएम की कुर्सी पाने के लिये अपराधियों का साथ लेते है। यहाँ किसी समुदाय की ओर ऊंगली न होकर व्यक्ति विशेष की ओर होता है, क्योकि मुख्यमंत्री या गृहमंत्री कोई व्यक्ति विशेष होता है। पुलिस के तौर पर केवल मुम्बई पुलिस को ली लिया जाता है और डाक्टरों के लिये भी कि वे बहुत बार पैसों की लालज में अपराधी तत्वों के साथ खड़े होते है। अब तक कितने नेता, डाक्टर व पुलिस समुदाय आहत हुआ।
- पुन: विधि की ओर आऊँगा, सिर फिरे वकील द्वारा मुकदमा दायर करने की बात ऊठी थी। इसका भी विश्लेषण करना चाहूंगा। आज अधिवक्ता पेशे में नैतिक मूल्यों में काफी गिरावट आयी है। ज्यादातर युवा अधिवक्ता कोर्ट में कम सड़को पर ज्यादा नज़र आते है। इस प्रकार युवाओं द्वारा अपनी माँगों को लेकर तोड़ फोड़ या बलबा नैतिक है। क्या कोई आम आदमी अपनी ओर से मुकदमा दायर करके, इनके अनैतिक बंद तथा तोड़ फोड का विरोध नही कर सकता है। क्योकि आम आदमी को विधिक जानकारी नही होती है। अत्यंत खेद का विषय है कि कोई वकील क्यो नही अपने समुदाय इन कृत्यो को अवैध शिद्ध करने के लिये मुकदमा दायर नही करता है।
- वर्तमान समय मे हम हर समय विधि का उंलघन करते है, कहीं पान खाकर थूकते है तो कहीं सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान आदि ऐसे विषय है जहाँ विधि का तोड़ा जाता है किन्तु आप फिर से विधि को तोड़ कर पुलिस या सक्षम अधिकारी को घूस देकर छूट सकते है।
- करीब 2 साल पूर्व जिस प्रकार एक कथित ब्लाग न इलाहाबाद उच्च न्यायालय की गरिमा को तार तार किया उसे भी कतई उचित नही कहा जा सकता था, किसी उच्च न्यायालय के न्यायधीश पर ऐसी टिप्पणी मैने तो कभी नही देखी थी।
कसाब के सम्बन्ध में न्यायालय से तो मेरी यही माँग होगी कि कोई न्यायधीश इस मामले में लीक से हट कर अपना ऐतिहासिक फैसला दे, और न्याय की गरिमा को बनावटी गवाहो तथा साक्ष्यों से धोखा न दिया जा सकें। मा. सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के को किसी भी जगह त्वरित न्याय देने का अधिकार है, वह अपनी अदालत किसी भी समय किसी भी जगह लगा सकता है, न्याय को कसौटी पर मापने को स्वतंत्र है। निश्चित रूप से आज समय है कि देश की दर्द भरी पुकार को न्यायालय सुने और अपना एतिहासिक फैसला दे ताकि कोई अन्य गतिविधि को अंजाम देकर कसाब को बचाने का प्रयास न किया जा सके।
अजमल कसाब के सम्बन्ध में यही कहना चाहूँगा कि मीडिया, भारतवासियों तथा बहुत माध्यमों से शिद्ध है कि वह आतंकवादी के रूप में हमला किया व पकड़ा गया। दुर्भाग्य है कि किसी वीर सैनिक की गोली उसके सीने में नही लगी अन्यथा उसे बेकसूर शिद्ध करने का प्रश्न ही खत्म हो गया होता। आज जिंदा पकड़े जाने पर उस आतंकवादी को बेकसूर साबित करने की कोशिश की जा रही है। प्रश्न उठता है कि जो आतंकवादी गोली का शिकार होकर मारे गये वे भी तो बेकसूर हो सकते थे जब कसाब के बारे में बेकसूर होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। अरूण जी ने जो आक्रोश व्यक्त किया, करीब बहुत से पाठको ने अपना सर्मथन व्यक्त किया था, जिसमें मै भी था। जिस प्रकार लेख को गलत कहा गया कि ''तीसरा खम्भे'' की नज़रों में यह अपराध है। अगर ऐसा है तो तीसरे खम्भे में जरूर घुन लग रहा है और यह घुने हुये तीसरे खम्भे की सोच ही हो सकती है क्योकि लेख में कुछ गलत नही था यदि था तो उसे डीलिट करने के अलावा भी कई उपाय सोचे जा सकते थे, किन्तु सीधे डीलीट करने की अनुशंशा करना ठीक नही था। जब अनुमोदन पर लेख हटाया जा सकता था तो लेख को बरकरार रखते हुये अपत्तिजनक बातो को हटाया जा सकता था। जिससे लेख भी बरकरार रहता और भावनायें भी। विधि का पालन होना जरूरी है न कि उसका आतंक, लेख डिलीट करने जैसी घटना ''विधिक आतंकवाद'' को जन्म देती है। लेखको के समक्ष लेख हटाने व वापस लेना अन्तिम विकल्प होना चाहिये।
