Jul 2, 2006

महाशक्ति क्रिकेट प्रतियोगिता
इलाहाबाद विजेता आधिवक्ता उप विजेता मुन्शी
आयोजन स्‍थल लूकरगंज मैदान
आयोजक महाशक्ति
सहयोग अधिवक्‍ता व मुन्‍शी गण

महाशक्ति क्रिकेट प्रतियोगिता हर वर्ष की भाति वर्ष 2005 मे भी आयोजित की गयी। इस प्रतियोयिता मे एक मैत्री व सद्भभावना मैच खेला जाता है जिसमे इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के अधिवक्‍ता तथा उनके कर्मचारियो (मुन्शियो) के बीच खेला जाता है जिसमे न कोई साहब होता है न कोई मुन्‍शी। इस मैच का आयोजन उच्‍च न्‍यायालय के शीतावकाश अर्थात दिसम्‍बर माह मे होता है।

प्रमेन्द्र प्रताप सिह्

गंगा सरस्वती विवाद


भारत में बहने वाली गंगा और सरस्वती नदियाँ वास्तव में स्वर्ग की देवियाँ हैं जो आपसी विवाद के बाद एक-दूसरे को दिए गए शाप के कारण वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुई हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु की तीन पत्नियाँ- लक्ष्मी, गंगा और सरस्वती थीं। एक बार विष्णुजी ने गंगा के प्रति विशेष अनुराग और लगाव दिखाया जिसके फलस्वरूप सरस्वती के मन में ईर्ष्या भाव उत्पन्न हो गया। सरस्वती तीनों पत्नियों के प्रति समान अनुरक्ति रखने के आर्योचित सिद्धांत की उपेक्षा करके गंगा के प्रति आसक्ति दिखाने के लिए अपने पति विष्णुजी को खरी-खोटी बातें सुनाने लगीं। सरस्वती ने गंगा को भी आड़े हाथों लेकर दुर्वचन कहे।
विष्णुजी पत्नियों के इस कलह को देखकर प्रासाद से बाहर चले गए। बिना कुछ कहे इस तरह पति के बाहर चले जाने से तो सरस्वती का क्रोध और भी भड़क उठा। उन्होंने गंगा के केश पकड़े और मारने को लपकीं। लक्ष्मी ने बीच में आकर दोनों को शांत करने का प्रयास किया। इस पर सरस्वती ने लक्ष्मी को भी गंगा की सहायिका मानते हुए उनका अपमान किया और उन्हें बीच में आने के कारण वृक्ष हो जाने का शाप दे दिया।
इधर गंगा अपने कारण निरपराध लक्ष्मी को दंडित होते देखकर अत्यधिक क्षुब्ध हो उठीं और उन्होंने सरस्वती को भूतल पर नदी हो जाने का शाप दिया। सरस्वती भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने भी गंगा को मृतक की अस्थियाँ ढोने वाली नदी बनकर पृथ्वी तल पर बहने का शाप दे दिया।
जब विष्णुजी अपने पार्षदों सहित लौटे तो उन्हें अपनी पत्नियों के परस्पर कलह और शाप आदि का पूरा पता लगा। विष्णुजी ने लक्ष्मी की शांत वृत्ति, सहनशीलता और उदारता को देखकर केवल उसे ही पत्नी रूप में अपने पास रखना उचित समझा। विष्णुजी ने गंगा और सरस्वती को त्याग देने का निश्चय कर लिया।
वियोग की अवश्यंभावी स्थिति से व्यथित होकर दोनों ही कातर स्वरों में शापों से शीघ्र निपटने का उपाय पूछने लगीं। विष्णु ने उन्हें बताया कि गंगा तो नदी रूप में स्वर्ग, भूलोक और पाताल लोक में त्रिपथगा होकर बहेंगी। उनका स्थान शिव जटाओं में भी होगा। अंश रूप में ही वे स्वर्ग में मेरे सानिध्य में रहेंगी। सरस्वती प्रधान रूप से पृथ्वी तल पर रहेंगी और अंश रूप में मेरे पास। लक्ष्मी 'तुलसी' वृक्ष बनकर मेरे शालिग्राम स्वरूप से विवाह करके समग्र और स्थायी रूप से मेरा पत्नीत्व ग्रहण करेंगी। दोनों देवियाँ शापानुसार नदी रूप में पृथ्वी पर आईं।
पृथ्वी पर स्रोतों में जो सर (जल) दिखाई देता है, उस सर का स्वामी सरस्वान कहलाता है और सरस्वान की पत्नी होने से सरस्वती सरस्वती कहलाईं। सरस्वती नदी तीर्थरूपा हैं। वे पापनाश के लिए जलती अग्नि के समान हैं।
गंगा और सरस्वती का विवाद यही गंगा और सरस्वती शाप के कारण भूलोक में नदी बनकर बहती हैं। राधा-कृष्ण के शरीरों से उत्पन्न उनके स्वरूपों का दर्शन कराने वाली गंगा अत्यंत पवित्र, सर्व सिद्धिदात्री तथा तीर्थरूपा नदी हैं।
कलयुग में गंगा का भविष्य पुराणों में कहा गया है कि सरस्वती के शाप से भारतवर्ष में आईं गंगा शाप की अवधि पूरी हो जाने पर यानी कलियुग की समाप्ति पर पुन: भगवान श्रीहरि की आज्ञा से बैकुण्ठ चली जाएँगी।
विकीपीडिया से

Jul 1, 2006

ईशावास्‍योपनिषद्

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

॥ अथ ईशोपनिषत् ॥

ॐ ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥

अनुवाद :- अखिल विश्‍व मे जो कुछ भी गतिशील अर्थात चर अचर पदार्थ है, उन सब मे ईश्‍वर अपनी गतिशीलता के साथ व्‍याप्‍त है उस ईश्‍वर से सम्‍पन्‍न होते हुये से तुम त्‍याग भावना पूर्वक भोग करो। आसक्‍त मत हो कि धन अथवा भोग्‍य पदार्थ किसके है अथार्थ किसी के भी नही है ? अत: किसी अन्‍य के धन का लोभ मत करो क्‍योकि सभी वस्‍तुऐ ईश्‍वर की है। तुम्‍हारा क्‍या है क्‍या लाये थे और क्‍या ले जाओगे।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥

अनुवाद:- इस भौतिक जगत् मे शास्‍त्र निर्दिष्‍ट अर्थात अग्निहोत्र आदि कमों को करते हुये सौ वर्षो तक जीने की इच्‍छा करें यही मनुष्‍य की अधिकतम आयु है इस प्रकार मनुष्‍यत्‍वाभिमानी कर्म लिप्‍त नही होगे। इसके अतिरिक्‍त दूसरा मार्ग भी नही है।


असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-मस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भू-र्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ ९ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।


अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया


इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १० ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः ॥ १२ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः ।
यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ १७ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥ १८ ॥

कृपया प्रतीक्षा करे कार्य प्रगति पर है।

॥ इति ईशोपनिषत् ॥

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥


ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

पाठक जनो तथा विद्वानो से अनुरोध है कि गलतियो तथा सुझावो अवश्‍य बताये तकि सुधार किया जा सके। मै आभारी रहूंगा।