Oct 20, 2006

जय बजरंग बली तोड दुश्‍मन की नली

आज हनुमान जयंती है, ये वही हनुमान जी है जिन्‍हे हम बजरंग बली के नाम से जानते है। प्रयाग के बारे मे विख्‍यात है कि जितने हनुमान मन्दिर है उतने किसी देवी देकता के नही है। प्रयाग मे जितने भी मन्दिर मे जा‍इये, कुछ अपवाद को छोडकर आपको हर जगह हनुमान जी की मूर्ति अवश्‍य मिलेगी। ‘प्रयाग के रक्षक’ के रूप मे संकट मोचन के हर गली चौराहे पर एक न एक मन्दिर अवश्‍य मिल जायेगा। हनुमान मन्दिरो के बारे मे विख्‍यात है कि हनुमान जी का मन्दिर सर्वधिक प्रयाग मे ही है।


हनुमान एक रूप अनेक, हनुमान जी के विभिन्‍न मन्दिरों त्रिपौलियां मे स्थित बाल स्‍वरूप मे विराजमान है। हनुमान जी का यह स्‍वरूप अद्धभुत एवं दुर्लभ है।
दूसरा प्रमुख मन्दिर हाईकोर्ट के समीप स्थित है जहां पर वे विप्र रूप मे स्थित है इस प्रतिमा की खास वि शेषता यह है कि यह आशीर्वाद या अभय देने की मुद्र मे है, और यह मुर्ति संगमरमर की है जिसके कारण इस पर कभी सिन्‍दूर नही लगाया जाता है। ये हनुमान जी प्राय: लड्डूओं मे ही खेलते है कारण भी है, प्राय: केस की जीत पर जीतने वाले के द्वारा लड्डूओ की बौछार की जाती है।

सिविल लाइन्‍स स्थित हनुमान हनुमन्‍त निकेतन यहां पर हनुमान जी की सर्वांग स्‍वरूप प्रतिमा भगवान का जीतेनद्रीय रूप है, यहां कि विशेषता यह है कि यहां मंगलवार और शनिवार को विशेष पूजा होती है और अपार भीड देखने को मिलती है। इस मन्दिर मे भीड देखना हो तो जग हाईस्‍कूल और इण्‍टर का रिजल्‍ट निकलता है तब पूरा का पूरा जनसमुदाय उमड पडता है। जैसे हाल मे ही रीलीज किसी सुपर-डुपर हिट फिल्‍म का फर्स्‍ट शो का टिकट मिल रहा है। 

त्रिवेणी संगम के पास लेटे हुये बडे हनुमान जी का सिद्ध मंदिर, कहते है कि एक व्‍यापारी इसे नाव से ले जा रहा था, पर नाव किले के पास डूब गई, और बाद मे बाद्यंबरी बाबा ने अपनी साधना से मन्दिर मे मूर्ति को स्‍थापित किया। यह वही मन्दिर है जहां पर प्रतिवर्ष तीनों पवित्र नदियां हनुमान जी को स्‍नान कराती है। हनुमान जी के इस मन्दिर के विषय मे मन्‍यता है कि मुगल शासको ने इस मन्दिर की मूर्ति को निकालने का प्रयास किया किन्‍तु यह निकनले के बजाय अन्‍दर की ओर जाती रही और इसी के साथ यह लेटे हुऐ हनुमान के रूप मे विख्‍यत हो रहे है।

एक अन्‍य मन्दिर दारागंज रेलवे स्‍टेशन के नीचे छोटे हनुमान जी का है, जिसकी स्‍थापना शिवाजी महाराज के गुरू समर्थ गुरू रामदास ने किया था।

रामबाग स्थित हनुमान मन्दिर मे दक्षिणमुखी प्रतिमाविद्यमान है कहते है कि पहले यह प्रतिमा ऊपर थी, बाद मे एक दिन छत टूट कर नीचे आ गई पर खडिंत नही हुई तब से नीचे ही स्‍थापित है।

यह मेरी ओर से हनुमान जयंती पर इलाहाबाद के मन्दिर के बारे मे जानकारी थी , कई मन्दिर और भी है पर वे मेरी जानकारी मे नही है। अगर वाराणसी मन्दिरो का शहर है तो प्रयाग हनुमान मन्दिरों का।


आप सभी को हनुमान जयंती तथा दीपोत्‍सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाऐ।

Oct 19, 2006

दीवार मे सेध

कोई चुल्‍लू भर पानी दे दे
11, 0, 15, 18, 9, 26, 6, 0, 7 और 4 यह कोई लाटरी का नम्‍बर नही है। कि जो आप आपनी लाटरी के नम्‍बरो को मिला रहे है यह वे रन है जो पिछली दस परियो मे द्रविड के बैट से निकले है। यह वही द्रविड है जो भारतीय क्रिकेट के मजबूत दीवार के नाम से विख्‍यात थे और गागुंली के कप्‍तानी के विकल्‍प के रूप भी। मगर आज इस दीवार मे लोना कैसे लग गया? इसका उत्‍तर तो द्रविड के पास भी नही होगा। कुछ इसी तरह की पारियो के कारण गागुंली की विदायी की गई थी। गांगुली की विदायी का कारण उनका रन न बनाना न होकर ग्रेग चैपल की प्रयोगशाला मे हस्‍तक्षेप था जो जो चैपल को पंसन्‍द न था । क्‍योकि तत्कालीन परिस्थितियो मे भले ही गांगुली रन नही बना रहे थे किन्‍तु टीम अच्‍छा प्रर्दशन अच्‍छा प्रर्दशन कर रही थी। पिछले 5 साल के क्रिकेट के इतिहास मे पहली बार हुआ होगा कि भारत फाईनल मे स्‍थान बनाने से चूक गया।

भारतीय क्रिकेट मे जो कुछ हो रहा है वह शुभ प्रतीत नही हो रहा है, जिस प्रकार द्रविड के दब्‍बू कप्‍तानी के आगे भारतीय खिलाडियो का मनोबल गिर रहा है , जो आज हो रहा है वह गांगुली के समय मे नही था। आज केवल तेन्‍दूलकर का बल्‍ला बोल रहा है इसका कारण भी है यही है कि वे एक मात्र शक्‍स है जिसका टीम मे स्‍थान पक्‍का है अन्‍या‍था हर भारतीय खिलाडी भारतीय क्रिकेट टीम मे आपना अन्तिम मैच खेल रहा होता है और यही कारण है प्रत्‍येक खिलाडी के मनोबल मे गिरावट आया है। किन्‍तु यही टीम थी जिसका नेतृत्‍व गांगुली कर रहे थे और तेन्‍दुलकर और गांगुली को छोड सभी अपना सर्वश्रेष्‍ठ प्रर्दशन कर रहे थे। किन्‍तु आज परिस्थितिया बदल गई है। एक समय भारतीय क्रिकेट टीम संधर्ष के दौर मे थी, और भारत की दीवार के लिये भी टीम मे जगह नही थी, किन्‍तु गांगुली के नजरो मे द्रविड की भूमिका महत्‍वपूर्ण थी और एक विकेट कीपर के तौर पर द्रविड को टीम मे शमिल किया और उन्‍होने अपने सर्घषो के दौर मे अच्‍छा प्रर्दशन भी किया यही होता है कैपटन का सहयोग जो खिलाडियो का मनोबल बृद्धि करता है। मगर यह द्रविड के मे नही है। आज जो प्रयोग इरफान पठान के साथ किया जा रहा है यही गागुली ने भी किया था जब अजित अगरकर के साथ को तीसरे नम्‍बर पर भेजा था और उन्‍हो ने भी अपना सर्वश्रेष्‍ठ किया था। पर गागुंली के प्रयोग को टीम मे भय फैलाने की संज्ञा दी गई, और आज जो हो रहा है वह प्रयोग शाला की उपज बताई जा रही है।

मेरा स्‍टम्‍प देखो वो जा रहा है
गागुंली के समय अनेको भारतीय खिलाडी रेटिंग मे शीर्ष पर रहते थे और शीर्ष 20 मे यह संख्‍या 5 से 6 खिलाडियो की होती थी, भारत वनडे मे दूसरे नम्‍बर की टीम होती थी, गेदबाज भी अपनी भूमिका मे फिट रहते थे पर आज दहशत फैलाई जा रही है चैपल द्वारा दामे मूक सर्मथन द्रविड दे रहे है। जो गड्डे द्रविड ने कप्‍तानी प्राप्‍त करने के लिये खोदे थे आज उसमें ही फंस रहे है। हर खिलाडी का अच्‍छा और खराब दौर आता है अब समय द्रविड का है और देखना है कि चैपल तथा चयन समिती कब तक द्रविड को अभयदान देती है।

Oct 5, 2006

गांधी वाद खडा चौराहे पर !

देश की सत्‍ताधारी पार्टी कांग्रेस के द्वारा अलग-अलग समय के अलग-अलग नेतृत्व के संबंध को लेकर आज देश दुविधा में है। आज सम्पूर्ण देश सिर्फ यही सोच रहा है कि कांग्रेस तब ठीक थी अथवा अब। मै बात कर रहा हूं आज से 75 साल पहले की घटना कि जब काग्रेंस का नेतृत्‍व अपरोक्ष रूप से गांधी जी करते थे, तब जो स्थिति काग्रेंस मे महत्‍मा गांधी की थी आज उससे भी बढकर सोनिया गांधी की है। व्‍यक्ति तथा उद्देश्‍य अलग अलग है किन्‍तु घटना एक ही है उस समय भी संसद (नेश्‍नल असेम्‍बली) में बम विस्फोट किया गया था आज भी संसद पर हमला किया गया है। तब हमला करने का मकसद देश भक्ति थी और आज वतन के साथ गद्दारी है।


आज संसद पर हमला एक वाले अंतकवादी की फांसी की माफी वही पार्टी कर रही है जिसने वीर शहीदो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी माफी का विरोध किया था, गांधी जी का कहना था कि मै अहिंसा के मार्ग रोडा डालने वाले का समर्थन नही करूंगा, तब के देश भक्‍त अहिंसा के मार्ग मे रोडा थे तो आज के गद्दार कौन शान्ति के कबूतर उडा रहे है? यह वही पार्टी है जब तीनो देश भक्‍तो को फांसी पर लटकाया जा रहा था तो काग्रेस गा रही थी- साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। तब से आज तक इस पार्टी ने कमाल करने मे कहीं क‍मी नही की है, तब काग्रेस मे गांधीवादी के रूप मे कमाल हो रहा था तो आज आंतकवादी के रूप मे हो रहा है। आज कग्रेस बीच चौराहे पर खडी है, वह तब से आज के दौर मे 180 अंश पलट चु‍की है। आज काग्रेस के एक मुख्‍यमंत्री फांसी का विरोध कर रहे है तो काग्रेंस नेतृत्‍व मूक दर्शक बनी हुई है, तब भी काग्रेस मूक दर्शक की भातिं खडी थी जब पूरा देश गांधी जी से तीनो शहीदो की प्राणो की भीख मांग रहा था। पूरे देश को पता था कि गांधी जी ही वीर शहीदो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी से बचा सकते है पर अपनी हटधर्मिता के कारण गाधी जी ने फांसी से माफी बात नही की, अन्‍यथा गांधी ही वह नाम था जो अग्रेजो से कुछ भी मनवा सकता था। उनके सिर पर भूत सवार था कि अहिंसा का, पर अहिंसा की नाक आगे अगेंजो ने कितनो का दमन किया तब कहां था गांधी की अहिंसा। आज उस पार्टी के एक मुख्य मंत्री आंतकवादी का सर्मथन कर रहे हैं। काग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी मौन हैं। इस मौन का अर्थ समर्थन माना जाय या असमर्थन। जहां तक पार्टी प्रवक्ता सिंघवी की बात है वे अपने बयान में मुख्य मंत्री का समर्थन कर चुके हैं। आज देश के समक्ष प्रश्‍न है क्‍या वही गांधी की काग्रेस है यह फिर गांधी के आर्दश गांधी के साथ दफना दिये गये?


वह समय देश की आजादी का था देश के बच्चे की अपेक्षा थी कि गांधी जी इरिविन पैक्ट में अपनी मांगो में भगत सिंह आदि की फांसी को मांफी की मांग रखें किन्तु गांधी ने स्पष्ट कहा था इनकी मांफी हिंसा को बढ़ावा होगी। हम हिंसा का समर्थन नहीं कर सकते। आज देश के प्रत्येक देश भक्त व्यक्ति की इच्छा है कि लोकतंत्र की हत्‍या करने वाले अभियुक्त को फांसी दी जाये, किन्तु आज का नेतृत्व कुछ और सोच रहा है। यही बात मन में खटकती है। प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस सदैव देश की सामूहिक इच्छा के विपरीत काम करेगी? इससे तो यही प्रतीत होता है गाधी वाद दो अक्‍टूवर तक श्रद्धा के फूलो तथा नोटो पर फोटो तक ही सीमित रह गया है। और इन नेताओ ने गांधीवाद को वोट की खातिर चौरहे पर लाकर खडा कर दिया है। आज उनके वंशज गांधी वाद की नीव मे माठा डालने का काम कर रहे है । जो भूल गांधी ने तब की थी आज उनके वंशज कर रहे है।