Jul 15, 2007

इलाहाबाद की पहली ब्‍लागर भेंटवार्ता - महाशक्ति- हिन्दयुग्म नही थी

शशि भाई और मेरे मानवेन्‍द्र भइया


मै, माता जी, अमिताभ जी, शशि भाई,,देवेन्‍द्र भइया, राजकुमार

फोटों तो इतनी ही खीच पाया क्‍याकि बात करने से हीफुरसत नही मिली




इलाहाबाद की पहली ब्‍लागर भेंट वार्ता, आज तक ब्‍लागर पर आने की बाट जो रही थी। उसके मन में भी संसय था की उसका पदार्पण ब्‍लाग पर होगा कि भी नही। इलाहाबाद की पहली ब्‍लागर भेट वार्ता आज से लगभग 5 महीने पहले मेरे साथ शशि भाई और अमिताभ त्रिपाठी जी के साथ हुई थी। मैने इसे पोस्‍ट के रूप में प्रकाशित करने के लिये शशि भाई से हफ्ते भर में स्‍वीकृत‍ि ले ली थी किन्‍तु इसे पोस्‍ट न कर सका। आज समय मिला है तो मै आपके सामने अतीत की भेट वार्ता ला रहा हूँ। जो अभी तक मेरे मस्तिष्‍क में विचरण कर रही थी।

इस ब्‍लागर भेंट वार्ता का स्‍वरूप कुछ इस प्रकार सकार हुआ। एक दिन मेरे पास अचानक शशि भाई का ईमेल आया कि
"कि प्रमेन्‍द्र आने वाली 9 फरवरी को हम आपके इलाहाबाद मे होगें तुमसे मिलकर अच्‍छा लगेगा। कृपया अपना सम्‍पर्क सूत्र दो तुमसे मिलूँगा।

मै भी इस ईमेल को पढ़कर प्रसन्‍न था कि कोई मुझसे मिलने आ रहा है। मैने भी जल्‍दी में अपना लैन्‍डलाईन नम्‍बर और पता ईमेल कर दिया, पर मुसीबत आती है तो घेर कर आती है। जब 9 तारीख आई तो मेरा लैन्‍डलाइन खराब था। सुबह से लेकर दोपहर तक इन्‍तजार करता रहा कोई ही आया और फोन का तो आना नामुमकीन था। फिर मैने दोपहर में शशि भाई को फोन किया और शाशि ने कहा हैलो, मैने कहा मै प्रमेन्‍द्र आप मुझसे मिलना चाहते थे( जबकि मिलना तो मै चाहता था) शशि भाई ने भी जोरो खरोश के साथ मेरा अभिवादन किया और मुझे एक पता देकर वहॉं बुलाया कि क्‍या आप आ सकते हो ? चूकिं समयाभाव था और मैने जाने में असर्मथता व्‍यक्‍त कर दिया। बस फिर क्‍या था? इलाहाबाद की पहली ब्‍लागर भेंट वार्ता आयोजन से पहले ही दम तोड़ने जा रही थी।

शाम आते आते होनी को जो मंजूर था वह होने जा रहा था, शायं काल मुझे पिता जी ने एक जगह जाने को कहा, जब जगह का नाम सुना तो मेरी बाछें खिल गई। जो जगह शशि भाई ने बताई थी उसके पास ही पिताजी वाली जी जगह थी। तो फिर क्‍या था ? मेरे पास गाड़ी था, ड्राइवर और मेरा खास मित्र राजकुमार था। हम लोग पहूँच गये शाशि भाई से मिलने। जब पहुँचे तो वहॉं का रंग कुछ दूसरा था जहॉं एक ब्‍लागर से मिलना असंभव लग रहा था वहीं दो दों ब्‍लागरों से भेट हो रही थी। शशि भाई के साथ अमिताभ त्रिपाठी जी भी थे। फिर क्‍या था जम कर चर्चा हुई।

बातों ही बातों में कुछ देर बाद शाशि जी ने कहा कि मुझे नार्दन इण्डिया पत्रिका के कार्यालय में कुछ काम है। फिर शशि भाई को लेकर हम लोग पत्रिका कार्यालय लेकर गये और मेरे दीमाग की चक्‍करगिन्‍नी चली और गाड़ी में बैठाकर उन्‍हे बिना बताऐ अपने घर ले आये जबकि उनका मेरे घर पर आने का कोई प्रोग्राम नही था। सीधे घर पर पहुच कर उन्‍हे थोड़ा अजीब सा लगा किन्‍तु पहुँचने के बाद वे कर ही क्‍या सकते थे। मैने उन्‍हे उन्‍हे घर में बैठाया किन्‍तु वे बैठते थे वे जाने की जल्‍दी कर रहे थे। मै भी मै था मै भी बिना खतीरदारी किये उन्‍हे कैसे जाने देता ? मैने शशि भाई से कहा कि आपने चाय तो बहुतों पी होगी किन्‍तु एक ब्‍लागर की हाथ की बनी चाय पहली बार पीयेगे। शशि भाई भी राजी हो गये। चूकिं चाहे सुबह हो शाम चाय बनाना होता है मेरा काम।

मै चाय बनने गया तो मेरे भइया, माता जी और मित्र शशिभाई और अमिताभ जी से बाते कर रहे थे। चाय तैयार करके लाया और सबको पिलायी, शशि भाई चाय और मेरी जम के तारीफ की। फिर शशि भाई ने पिताजी से मिलने की इच्‍छा जाहिर की किन्‍तु वे अपने आफिस में काम मे व्‍यस्‍त थे। मैने उन्‍हे कहा कि मै उन्‍हे सूचना दे देता हूँ कि आप मिलना चाहते है फिर पिताजी आये। फिर मै शशि भाई को उनके गन्‍तव्‍य तक छोडने गया और धीरे धीर सभा विसर्जित हो गई। शशि भाई आपनी गाड़ी से पूर्व तो मै पश्चिम की ओर चल दिया पर कुछ देर बिताई गयी छवियॉं आज जी आखों से सामने नाच रही है।

बताइऐ आप कब आ रहे है ? मेरी हाथ की बनी चाय पीने :)

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