आज गाधी जी पर प्रश्न उठाने पर हो हल्ला किया जाता है कि गांधी जी ने ये किया, गाधी जी ने वो किया, गाधी जी भगवान है, गाधी जी से पहले दाग लगाने से पहले सोचाना चाहिए। आदि बाते इस बात की ओर इगिंत करती है कि आज के समाज का 35 प्रतिशत हिस्सा 65 प्रतिशत हिस्से पर हावी है। जिस प्रकार राम सेतु के मुद्दे पर सरकार द्वारा बहुसंख्यक वर्ग पर कुठारघात किया गया उसी प्रकार आज के समाज में कुछ प्रभावशाली लोगों का ही राज है। गांधी जी को इस प्रकार पूजा जाता है कि जैसे पहलवान वीर बाबा। गांधी जी को पूजना गलत नही किन्तु गांधी वाद के नाम पर अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ठगा नही जाना चाहिए।
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में जैसा प्रश्न भगत सिंह के नाम पर पूछा गया वह सर्वविदित है, आज मुट्ठीभर कुछ लोग देश की जनभावना को आंतकित कर रहे है। भगतसिंह को आंतकवादी बताना यही दर्शात है कि जो भी काम इस देश में हुआ गांधी के कारण ही हुआ। आज रोड़, गली,योजना, परियोजना, स्वथ्य केन्द्र, तो बिजली घर, डाक टिकट, नोट, आदि सब कुछ गांधीमय ही कर दिया गया। तथा सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि को आंतकवादी बताकर देश के नौनिहालों को उनके रास्तो से दूर किया रहा है। आज समय है ऐसी दमनकारी नीतियों का दमन करने का, और ऐसे किसी भी प्रसताव का विरोध करने का जिसे देश की जनता मनने को तैयार नही है। गांधी को हम पर थोपने के बजाय उन्हे आत्मसात करवाने की जरूरत है न कि सरकारी मिशनरी का दुर्पयोग करके उन्हे राष्ट्रपिता का दर्जा देने की।
यह सर्वेक्षण यह स्पष्ट करता है कि आज से 60 साल पहले भी लोगों पर गांधी जी को लोगों पर थोपा और आज भी थोपा जा रहा है। गाधी जी को थोपना तो मै मनता हूँ कुछ हद तक ठीक है किन्तु भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, आजाद, तिलक आदि को जनमानस से दूर करके का क्या औचित्य है, कुछ दिनों पूर्व एक राजनेता ने कहा था कि गाधी भी कुछ सालों बाद भगवान की श्रेणी में आ जायेगें और उन्हे भी पूजा जायेगा1 निश्चित रूप से यह सरकार का यह कृत्य भगवान राम को नकार कर, श्रीराम के स्थान पर गांधी जी को भगवान का दर्जा दिलाना ही है। जिस प्रकार देश के इतिहास से एक एक कर शहीदों के नाम गायब हो रहे है वह दिन दूर नही कि राष्ट्रीय प्रियंका-राहुल मेमोरिय ट्रस्ट की स्थापना न हो जाये1
इस सवेक्षण का मकसद सिर्फ इसना ही था कि लोग गांधी जी सच्चाई को जाने और खुद पर भरोसा कर गांधी-नेहरू परिवार की भाति अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का न भूलें। पोल में कुल 1300 से ज्यादा लोगों ने मतदान किया था। भारत नाम कि एक कम्यूनिटी में इस प्रश्न को हटा दिया गया किन्तु उसमें भी भी जब तक प्रश्न था करीब 135 लोगो ने मतदान में हिस्सा लिया था। इस कम्यूनिटी के हटने के बाद कुल 1149 मत पड़े जिसमें प्रश्न के पक्ष में 746 विपक्ष में 392 तथा कोई राय नही रखने वाले 11 थे। मै नही समझाता कि मेरा 252 शब्दों का लेख ब्लागर बन्धुओं को प्रभावित करता है कि नही किन्तु आज ऐसे लोगों की कमी नही है जो देश में परिवर्तन चाहते है। यह सवेक्षण हमे प्रेरित करता है कि कि हमें इस बात पर विचार करना होगा कि क्या सरकारों के दबाव में हमें अभी भी महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानना उचित है ?
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