Apr 30, 2007
विवदित लेख, नारद और पंगेबाज- मोहल्ला
मुझे अति प्रश्न्नता हो रहा है कि लोगों ने भड़काऊ लेखों पर टिप्पणी करना छोड़ दिया है। मेरे पिछले लेख मे एक भी टिप्प्णी नही आई, मात्र भूले बिसरे केन्द्र से अरूण जी ही आये। ऐसा नही है कि उसे किसी ने पढ़ा ही नही था। पढने वालो की संख्या भी कम नहीं थी। नारद के आकड़ों के अनुसार कुल 60 के करीब हिट्स प्राप्त हुई थी। ऐसा नही था कि मेरा लेख केवल भड़काऊ था, बल्कि वह सत्य के निकट भी था। मैने किसी भी प्रकार की अर्नगल बातों से परहेज किया था। मै अर्नगल बातों पर विश्वास नही करता हूँ, और सत्य बातों को ही रखने का पक्षधर हूँ। पिछले लेख पर टिप्पणी न होने का कारण यह भी हो सकता है जो आप खुद जानते है। शायद मोहल्ला तथा मोहल्ला प्रेमियों को मेरी चुनौती स्वीकार नही है और इनकी पत्रकारिता मात्र छलावा है यह अपने वैमनस्य रूप को टीवी पर दिखा नही पाते है तो इसलिये इन्होने ब्लागिग का सहारा लेना पड़ रहा है। अगर इनको लगता है कि ये सत्य कह रहे है तो जितनी पकड़ के साथ ये लोग ब्लाग मे तहलका मचाये हुऐ है उतनी ही तेजी से टीवी मे भी हाथ आजमाऐ।
दूसरी बात- नारद
कल मैने अपने ब्लाग पर एक चित्र डाला था करीब रात 8 बजे के आस पास जब मै रात्रि 10 बजे देखता हूँ कि मेरा ब्लाग कहीं पर दिख ही नही रहा था। पिछले कई घन्टों से पहले और दूसरे नम्बर की पोस्ट अपने स्थान पर यथावथ थे। फिर मैने नीचे देखना शुरू किया तो पता चला कि वह काफी नीचे चली गई है। अर्थात दोपहर 12 बजे के भी बहुत आगें और मात्र 12 धन्टे भी मेरी वह पोस्ट पहले पृष्ठ पर नही रही जबकि आज भी मेरे पहले से पोस् की गई पोस्ट आज भी यथावत है। शायद मुहल्ले वालो की जगह मेरी रेटिंग कम हो गई हो। :)
तीसरी बात- पंगेबाज- मोहल्ला
पंगेबाज बनाम मोहल्ला - मोहल्ला प्रकरण की उपज है पंगेबाजी और इस पंगेबाजी के दोषी है हम सब चिठ्ठाकारों द्वारा मोहल्ला को दी जाने वाली छूट के परिणाम स्वरूप उदय हुआ था पंगेबाजी का । न तो अरूण जी उस समय सक्रिय चिठ्ठाकारिता कर रहे थे। जो कुछ भी मोहल्ले की अर्नगल बाते छापना शुरू किया था निश्चित रूप से मोहल्ला के गलत बयानों से जन समूहिक की भावनाओं का उत्तेजित हो जाना स्वाभाविक ही था। निश्चित है कि जब किसी के स्वाभिमान को ललकारा जायेगा तो निश्चित है कि रक्त शिराओं मे विद्युत प्रवाहित हो ही जाती है। अनेकों लोगों को गुजरात दंगा तो दिखता है किनतु गोधरा प्रकारण क्यों नही दिखता है। यदि गोधरा मे ट्रेन की बोगियॉं न जलाई गई होती तो गुजरात के आगे की भयावह स्थिति देखने को न मिलती।
एक बन्धु ने आज अपने लेख मे जिक्र किया था कि जब एक हिन्दू मरता है तो पॉच मुस्लमान मारे जाते है। तो प्रश्न यह उठता है कि वह एक हिन्दू अखिर क्यों मारा जाता है? क्या इसका जवाब किसी के पास है? गुजरात दंगे वाले क्यों गोरखपुर और मऊ के दगें को भूल जाते है जिसमे अनेकों हिन्दूओं की जाने गई किन्तु किस धर्मर्निपेक्ष रहनुमाओं को नही लगा कि वह भी मरने वाले अदमी ही थे। बस कुछ कमी थी तो वे मुस्लमान न थे नही तो यह एक राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना और धर्मर्निपेक्षता के मौलवी अपना हिन्दू विरोधी तकिया कलाम पढ़ना शुरू कर देते।
भारत एक स्वतंत्र विचारों वाला देश है जहॉं पर हर प्रकार के लोग रहते है। सभी को अपने रीति रिवाजों से जीने का हक है। आज मुस्लिम आजादी के समय से 6 से 20 प्रतिशत पर जा पहुचे है जबकि बग्लादेश और पाकिस्तान मे हिन्दू 10 से 2 प्रतिशत पर आ पहुचे है तो आप सोच ही सकते है कि मुस्लिमों का कितना खतरा है भारत में? पाकिस्तान में मुख्य न्यायमूर्ति भगवान दास को अपने धर्म की शपथ नही दी सकती है वह भी सिर्फ अल्लाह की शपथ ले सकते है।
एक दूसरे को गाली देने से कोई फायदा नही है। दूसरों की कमियों को बताने से पहले अगर अच्छाईयों को देखें तो जिस बात को लेकर यहाँ झगडा हो रहा है वह नही होने वाला था।
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Apr 29, 2007
क्या ईसा और मुहम्द से गणेश अलग है?
हाल में ही मुझे गणेश जी की चित्र की आवाश्यकता हुई और मैने गूगल की शरण लिया तो देखा तो उपरोक्त चित्र पाया, इसे देख कर मन में क्षोभ भी उत्पन्न हुआ। कि विश्व मे किस तरह हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया जाता है। और विभिन्न कम्पनिया अपने प्रचार मे उनका प्रयोग करते है। अगर ईसा और मुहम्मद साहब के सम्बन्ध मे यह ठीक नही है तो क्या गणेश जी के सम्बन्ध मे यह कहाँ तक उचित है।एक कम्पनी तो विभिन्न देवी देवताओं के चित्र वस्त्रों पर प्रिन्ट है। वस्त्रों की बात तक तो ठीक थी पर उसे अन्त: वस्त्रों पर प्रिन्ट करना क्या हिन्दू भावनाओं को चोट पहुँचने के लिये नही है। तनिक विचार करें कि क्या यह उचित है ?












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Apr 27, 2007
लगातार 18 मैचों मे हार का क्या कारण है ?
हर दिन नही टीम बनाई जाती है। और सभी की खेल के प्रति सभी खिलाडि़यों की यह जिज्ञासा होती है कि क्या आज प्रमेन्द्र भइया (मैं) जिस टीम मे रहेगें वह टीम जितेगी कि नही ? मैच के बाद हर खिलाडी के जुबान पर एक ही बात होती है कि आज फिर जिस टीम मे प्रमेन्द्र भइया थे वह टीम हार गई।
यह शायद फील्ड का दोष है या कुछ और जब से हम लोग डीएसए क्रिकेट स्टेडियम मे खेलने जा रहे है मेरी टीम को जीत का स्वाद नही मिला है। मै यह कह सकता हूँ कि हर व्यक्ति को जीत का स्वाद मिल गया है, केवल मुझे छोड़कर।
ऐसा नही है कि जब भी मै हारा हूँ, मैने खराब प्रदर्शन किया है 18 मैचों मे केवल मै एक बार अपने प्रर्दशन के कारण हारा हूँ। जिसमे मैने एक ओवर मे 22 रन दनादन दिये थे। बाकी सर्वकालीन 18 मैचों मे अब तक लगभग 22 ओवरों 57 विकेट ले चुका हूँ जिसमे एक ओवर की लगातार चार बालों पर चार विकेट लिये थे। रनों का भी अम्बार लगाने मे कभी पीछे रहा हूँ। अब तक 222 से ज्यादा रन बना चुका हूँ।
पर आज के मै मे तो हद हो गई जीता जीताया मैच हाथ से निकट गया, आठ ओवरों मे जीत के लिये 42 रन बनाने थे। दो खिलाड़ी 18 गेंदों मे मात्र 6 रन ही बना पाये थे चूकिं हमारा नियम होता है कि हर किसी को बैटिंग मे प्रथमिकता देने की होती है। पर एक खिलाड़ी तो लगातार 14 गेंदे झेल गया। तो टीम मे कप्तान ने उसे रिटायर कर मुझे उतरने को कहा और मै रनिग छोर पर खडा था तभी वालिंग होती है और एक विकेट गिर जाता है। स्कोर होता है 19 गेंद 7 रन 1 विकेट। अर्थात जीतने के लिये 29 गेंदों पर 35 रन फिर स्ट्राइक मुझे मिलती है और फिर अगले दो ओवरों मे 1 छक्का और 2 चौका स्कोर होता है 5 ओवर 36 बन गये थे । और अगले ही गेद पर मै लम्बा शॉट खेलने के और एक अच्छे कैच के कारण आउट होना पडा और मेरे बाद दो विकेट शेष थे जीतने के लिये चाहिये था 1 गेंदों मे 7 रन पर धन्य हो मेरी टीम उसके आगे बिना रन बनाये आल आउट हो गई। सभी को लग रहा था कि आज मेरी टीम जीत जायेगी किल्तु नियति को मेरी हार ही पंसद थी। और हर जुबान पर फिर से यही चर्चा कि प्रमेन्द्र भइया जिस टीम मे रहते हे वो टीम डीएसए क्रिकेट स्टेडियम कभी नही जीती है। और सब हंसी के साथ घर चल देते है इस चर्चा केसाथ कि क्या कर मेरी टीम जीतेगी। मेरी हार का क्या कारण है क्या आपको पता है ?
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Apr 19, 2007
जिस मोहल्ले में गन्दगी तो वहॉं मत जाओं
गन्दगी किसी को पंसद नही है फिर भी क्यों जाते हो गन्दगी पर ? मोहल्ला नामक एक कुख्यात ब्लाग समाज समाज विद्वेश फैलाने का काम कर रहा है माफ कीजिएगा मैने समाज का नाम दे कर गलती कर रहा हूँ। कम्प्युटर तक ही सीमित है मोहल्ले की गन्दगी। केवल इनका उद्देश्य है कि हम लोगों मे फूट डाला जाये और ये लोग बैठ तमाशा देखें।
इन लोगों की स्थिति मुहल्ले की गन्दी सुअर की तरह है कि कितना भी अच्छा आप उनको खाना दीजिये किनतु अपशिस्ट पदार्थ के बिना उनका पेट नही भरता उन्ही की प्रजाति मे कुछ इस प्रकार के पत्रकार भी आते है। जो कितने भी विषय लिखने को न हो किन्तु इन्हे हिन्दुत्व विरोध के अलावा कुछ सूझता ही नही है।
मै तो सिर्फ इनता कहूँगा कि मोहल्ले की गलत पोस्ट का कद्धपि उत्तर मत दीजिये। गन्दगी को एक जगह तक सीमित रखिये। निश्चित है कि गन्दगी मे जायेगें तो आपके साथ गन्दगी आयेगी ही चाहे वो पैरों से ही क्यों न आये। जहॉं तक टिप्पणी की बात है तो जो भी अन्य टिप्पणी उनके ब्लाग पर आती है न तो उनका कोई मलिक होता है। यह सब टिप्पणी मोहल्ले के कर्त्ताधर्ता स्वयं बैठ कर कर देते है। क्योकि खुराफात के लिये कुछ तो करना ही होगा।
स्टार न्यूज पर हमला मीडिया के बडबोले मुँह पर तमाचा
अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहने वाली मीडिया की नीव अब कमजोर हो गई है। जहॉं पत्रकारिता सत्य के लिये जानी जाती थी, वही आज कौड़ी के भाव बिक रही है। हर न्यूज चैनल पर किसी न किसी राजनैतिक पार्टी का अधिपत्य है। तो एसे मे मीडिया पर विश्वास करना खुद से विश्वासघात के बराबर है।
Apr 17, 2007
लेख वापसी
मेरी दो पहियों की गाड़ी जिसमे बैठने का तैयार थी नौ सवारी
चलिये यह तो टिकट का मामला था किसी तरह समीर लाल जी ने इसे निपटा लिया किन्तु समीर लाल जी सहित नौ यात्रियों की समस्या थी कि गाड़ी रूक ही नही थी, इसका भी कारण था कि टिप्प्णी के रूप मे कोई लेडिस सवारी दिख नही रही थी। :)
भारत की गाडि़यों मे एक स्लोगन देखने को मिलता है वों है - बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला, उसी प्रकार मेरें पोस्ट के अन्त मे यह स्लोगन है-
जो मेरे ब्लाग पर आया है और पढ़ कर बिना टिप्पणी के जायेगा।
मेरी बददुआ है कि उसके अगले लेख की मॉंग का सिन्दूर उजड जायेगा।
मॉंग का सिन्दूर उजड तात्पर्य है कोई टिप्प्णी न आने से है। ;)
यह कहने का भी एक कारण है कल मैने साभार एक लेख कट पेस्ट किया था लगभग एक दर्जन बन्धु दर्शन देने आये थे किन्तु मेरी कट पेस्ट और जागरण पर पढने की मेहनत पर थूकना(कुटिप्पणी करना कि अच्छा कट पेस्ट किया है भाई) भी उचित नही समझा। अब एक सूनी माँग के मुँह से श्राप नही तो फूल झडे़गा। ;)
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बिना पुरुष के भी मां बनना संभव!
वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे उन कैंसर रोगियों को भी लाभ मिल सकेगा जो कीमोथेरेपी की वजह से संतान उत्पत्ति के लायक नहीं रह जाते। लंदन की पत्रिका डेली मेल में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। इससे जहां लाखों करोड़ों लोगों को आशा की एक किरण नजर आई है वहीं कई पक्षों ने इस तरह विकसित की गई शुक्राणु कोशिकाओं के दुरुपयोग पर नैतिक सवाल उठाया है। भारतीय प्रजनन विशेषज्ञ इस वैज्ञानिक कामयाबी पर खुश हैं। न्यू टेक मेडीवर्ल्ड की डॉ. गीता सर्राफ को उम्मीद है कि यह तकनीक कुछ वर्षो में ही अपने देश में उपलब्ध हो जाएगी। भारतीय संदर्भ में इस तकनीक के सामाजिक परिणामों के बारे में उनका कहना है कि यह एक तकनीकी कामयाबी है और इसका इसी रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।
आलोचकों का कहना है कि इससे नैतिकता की सीमाएं टूटेंगी और पुरुष की भूमिका गौण हो जाएगी। इस नई प्रक्रिया का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक प्रयोगशाला में ही शुक्राणु विकसित कर संतानहीन तथा बांझ महिलाओं की मदद कर सकेंगे। इस प्रक्रिया से शुक्राणु कोशिकाएं विकसित करने की तकनीक को लेकर ब्रिटेन में सरकारी स्तर पर भी भ्रुकुटियां तननी शुरू हो गई हैं। वैज्ञानिकों को आशंका है कि ब्रिटिश सरकार इस प्रकार के अनुसंधान कार्यो तक के लिए कृत्रिम शुक्राणु कोशिकाएं विकसित करने पर कानून में फेरबदल लाकर पाबंदी लगा सकती है।
इस प्रक्रिया के तहत मानव की अस्थिमज्जा से स्टेम सेल निकालकर उन्हें प्रयोगशाला में विकसित किया जाता है और फिर उन्हें उन विशेष कोशिकाओं में बदलने दिया जाता है, जिनसे शुक्राणु पैदा होते हैं।
जर्मनी की यूनीवर्सिटी आफ गौटिंजन में यह अनुसंधान करने वाले प्रोफेसर नेयरनिया का कहना है कि ये विशेष कोशिकाएं लगातार शुक्राणु नहीं पैदा करतीं, लेकिन उन्हें आशा है कि जल्दी ही यह भी संभव हो जाएगा। प्रोफेसर नेयरनिया का कहना है कि वह पहले ही यह दिखा चुके हैं कि किस प्रकार चूहे के भ्रूण से निकाली गई स्तंभ कोशिका से प्रयोगशाला में पूरी तरह सक्रिय शुक्राणु विकसित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे शुक्राणु से अंडाणु तैयार हुए जिनसे छह चूहे के बच्चों का जन्म हुआ। प्रोफेसर नेयरनिया ने कहा कि ये बात और है कि चूहे के बच्चे जीवित नहीं रह पाए थे।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अस्थि मज्जा में से ही स्तंभ कोशिका तैयार करने की वजह से प्रयोगशाला में विकसित कोशिकाओं को स्वीकार नहीं करने की आशंका भी समाप्त हो जाती है। उनका कहना है कि शुक्राणु कोशिकाओं बनने में मदद करने वाली सरटोली समेत अन्य कोशिकाओं को भी शामिल किया जा सकता है। प्रोफेसर नेयरनिया ने कहा है कि वह अपनी इस सफलता से काफी उत्साहित हैं तथा इसके बाद अब उनका अगला लक्ष्य स्परमैटागोनियल स्तंभ कोशिका विकसित करनी होगी, ताकि प्रयोगशाला में ही शुक्राणु तैयार किया जा सके। उन्होंने कहा कि इसमें तीन से पांच वर्ष तक का समय लग सकता है। प्रोफेसर नेयरनिया ने कहा है कि अगर उनका यह प्रयोग भी सफल रहा तो कीमोथैरेपी के कारण संतान उत्पत्ति की क्षमता खो चुके पुरुषों को लाभ मिल सकेगा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा भी हो सकता है कि संतानोत्पत्ति को बढ़ाने के लिए कभी जादुई गोली भी तैयार की जा सकेगी। हालांकि साथ ही यह भी आशंका व्यक्त की गई कि प्रयोगशाला में विकसित अंडाणुओं और शुक्राणुओं को मिलाकर पूरी तरह से कृत्रिम तरीके से बच्चे पैदा किए जा सकेंगे।
पत्रिका में कहा गया है कि इस प्रक्रिया से समलैंगिक जोड़ों को भी संतान का सुख मिल सकेगा। ब्रिटिश फर्टिलिटी सोसाइटी के सचिव डॉक्टर ऐलन पेसी ने इस प्रकार शुक्राणु और अंडाणु विकसित करने पर पाबंदी लगाने के औचित्य को नकारते हुए कहा है कि इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाना सर्वथा अनुचित होगा तथा सुरक्षा के आधार पर लगने वाली किसी भी प्रकार की पाबंदी केवल तभी लगाई जानी चाहिए जब किसी भी उपचार से जुड़े सभी खतरों की पूरी तरह जांच कर ली जाए।
ब्रिटेन का स्वास्थ्य मंत्रालय इस प्रकार से कृत्रिम तरीके से भ्रूण और अंडाणु विकिसित किए जाने के खिलाफ है तथा इन पर पाबंदी लगाए जाने के पक्ष में है। उसका कहना है कि ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन तथा कई संगठन भी ऐसा ही चाहते है।
साभार - दैनिक जागरण
Apr 9, 2007
ब्लाग मालिक द्वारा की जा रही है अपने ब्लाग पर दूसरों के नाम पर टिप्पणियॉं
चूकिं दूसरे के नाम की टिप्पणी खुद करना, शोभनीय नही है। अखिर कोई किसी के लेख को कैसे बिना अनुमति क टिप्पणी के रूप मे ले सकता है? लेख अपनी जगह मायने रखता है और टिप्पणी अपने जगह।
विषय की गम्भीरता को देखें क्योकि यह हिन्दी चिठ्ठाकारिता को ठेस पहुँचाती है।
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Apr 6, 2007
अल्पसंख्यक मामले मे स्थागानादेश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कल के निर्णय को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चुनौती देते हुऐ इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई। याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस एसआर आलम और कृष्णमुरारी की खंडपीठ ने फ़ैसले पर रोक लगा दी।
निर्णय पर रोक लगाने से पूर्व भारत सरकार के पूर्व वरिष्ठ स्थाई अधिवक्ता श्री बी.एन.सिंह ने न्यायालय से इस मामले पक्ष बनने की बात कहते हुऐ कहा कि यह मामला काफी महत्वपूर्ण है और इसे सोमवार को रखा जाये ताकि इसमें इन्टर विनर अप्लीकेशन दाखिल की जा सके। न्यायालय ने उक्त याचना को अनसुना करते हुऐ कहा पहले आप इन्टर विनर अप्लीकेसन लाये तभी आपको सुना जा सकता है। इसके जवाब मे श्री सिंह ने कहा यह पुनर्विचार याचिका इतनी जल्दी आई है और इसे न्यायालय ने इतनी त्वरित सुनवाई हेतु न्यायलय मे मगवा लिया है अत: इसमें इन्टर विनर नही दिया जा सका है।
इस मामले मे सरकार का पक्ष रखते हुए उत्तर प्रदेश के महा-अधिवक्ता एसएमए काज़मी ने कि न्यायालय ने ये फ़ैसला अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किया है क्योंकि याचिका में ये मुद्दा उठाया ही नहीं गया था। तकनीकि आधार पर न्यायलय ने कल के रोक लगा कर सुनवाई की अगली तिथि 14/5/2007 निर्धारित कर दिया है।
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माननीय न्यायमूर्ति पर ही आक्षेप! क्या यही लोकतंत्र है ?
माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन ऐतिहासिक फैसला कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान अब अल्पसंखक नही है। न्यायालय के इस फैसले से सेक्युलर राजनैतिक दलों मे ज्यादा बेचैनी है कि उनके प्रिय वोटर अब अल्पसंख्यक नही रह गये है। बेचैनी होना स्वाभाविक भी है हमेशा मुयलमानों को बरगला कर वोट की राजनीति खेलते थे। अखिर सेक्यूलिरिज्म के नाम पर हिन्दूओं के साथ भेद भाव ? हिन्दु हितों की बात करना हिन्दुत्व व सम्प्रादयिकता है, और मुस्लिम हितों की बात करना धर्मनिरपेक्षता। यह कैसा राजनीति ?
माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री शम्भू नाथ श्रीवास्तव के इस निर्णय को यह कहा जाना कहा तक उचित होगा कि यह फैसला असवैधानिक ? मानानीय न्यायमूर्ति ने अपने फैसले मे क्या गलत कहा? इसका विश्लेषण इन निर्णय का विरोध करने वालों को करना चाहिये। सोचनीय विषय है कि जब भारत आजाद हुआ था तब भारत मे मुस्लिमों की जनसंख्या का प्रतिशत 5% प्रतिशत के आसपास था इस प्रकार इस समप्रदाय की जनसंख्या मे कई गुनी वृद्धि देखने के मिली। जिसकी जनसंख्या मे चार गुने से अधिक की वृद्धि हो रही है वह अल्पसंख्यक कैसे हो सकता है? अगर विश्लेषण किया जाये तो यह प्रतीत होता है कि भारत के सभी राज्यों मे मुस्लिम धर्म की जनसंख्या 10% से अधिक है और यह कई राज्यो मे 20-30 प्रतिशत से उपर है कई राज्य ऐसे है जहॉं हिन्दूओं की जनसंख्या 30% से भी कम है। वहॉं भी हिन्दू समुदाय बहुसंख्यक हो सकता तो तो मुस्लिम समुदाय को अल्पसंख्यक धोषित किया जाना कहॉं तक उचित होगा?
अखिर अल्पसंयकों को नापने के लिये क्या पैमाना होना चाहिये? आज अपना देश विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है भले ही धर्म निरपेक्ष राष्ट्र कहा जाये किन्तु मुस्लिमों की जनसंख्या को झुटलाया नही जा सकता है। वह देश जहॉं विश्व के दूसरे नम्बर पर सबसे अधिक मुस्लिम रहते है वहॉं पर मुस्लिम अल्पसंख्यक कैसे हो सकते है। देश के ऐसे मक्कार नेताओं की तुच्छ सोच का नतीजा है कि इनती अधिक संख्या मे होने के बाद भी मुसिलमों को अपने को अल्पसंख्यक धोषित करने के लिये संर्घष करना पड़ रहा है। और मुस्लिम समान इस भ्रम मे हे कि उन्हे इस धूर्तो के बल पर अल्पसंख्यक बनाये रखा जायेगा।
मै टेलीविजन देख रहा था और उस समय एक समाचार चैनल मे एक समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेता की हताशा देखते ही दिख रही थी। मै उनकी बात को सुन का सकते मे आ गया क्ि कोई व्यक्ति इस तरह से माननीय न्यायमूर्ति के उपर अक्षेप कैसे कर सकता है। यह तो प्रत्यक्ष रूप से न्यायमूर्ति तथा न्यायलय की अवमानना का प्रश्न उठता है। उन नेता के कथन थे -
यह न्यायाधीश राजनीति से प्रेरित है और इसके पहले भी वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पर विवादित निर्णय दे चुके है। यह उत्तर प्रदेश के चुनाव के देखते हुए फैसला आया है।
नेता द्वारा यह कहा जाना पूरी न्याय व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाना है। क्या अब मुस्लिमों का न्यायालय के प्रति कोई उत्तर दायित्व नही ? लगता है कि यही स्थिति रही तो कोई भी न्यायाधीश न्याय की तरफ सोच भी नही सकता है। मुझे याद है कि एक बिहार उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति ने एक बार अपने फैसले मे मुस्लिम ध्वनि विस्तारक(लाउडस्पीकर) के सम्बन्ध मे फैसला दिया था पूरी पूरा का पूरा मुस्लिम समुदाय न्यायमूर्ति के खिलाफ हो गया, उनके आवास पर पत्थर बाजी कि गई बाद मे न्यायमूर्ति को अपना तबादला अन्य राज्य मे करवाना पढ़ा। क्या इस मुस्लिम नेता का बयान भउकाउ नही था कया यह माननीय न्यायमूर्ति के खिलाफ उनमाद का प्रतीक नही था।
इस फैसले पर कुछ लोगों का कहना है कि यह असवैधानिक फैसला है पर हाल मे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश मे कहा था कि उसे सविंधान का अधिकार है वह तय कर सकता है कि क्या संवैधानिक है या असंवैधानिक, तब उच्च न्यायलय के फैसले को असवैधनिक कहना कहॉं तक सही है? अगर फैसला गलत है तो क्या सवोच्च न्यायालय की मौत हो गई है। माननीय न्यायमूर्तियों पर सीधा अक्षेप किया जाना कहॉं तक सहीहै ?क्या इससे न्याय व्यवस्था बरकरार रहेगी?
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Apr 5, 2007
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एतिहासिक फैसला

आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एतिहासिक फैसला दिया कि उत्तर प्रदेश मे मुस्लिम अल्पसंख्यक नही है। न्यायालय ने कहा कि चूकिं मुस्लिमों की जनसंख्या उत्तर प्रदेश मे 18% से ज्यादा है इस लिये इन्हे अल्पसंख्यक कहा जाना गलत है। न्यायालय ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश मे एक दर्जन से ज्यादा ऐसे जिले है जहॉं पर मुस्लिमों की जनसंख्या 40% से ज्यादा है।
नवीन जनगणना के अनुसार न्यायालय ने कहा कि भारत की आजादी के समय से घोषित अल्पसंख्यक सदा हमेशा के लिये अल्पसंख्यक घोषित नही रह सकते है। जैसा कि अल्पसंख्यकों के सम्बन्ध में आजादी के समय अल्पसंख्यकों के सम्बन्ध में 5% कम को ही अल्पसंख्यक माना जाय। जोकि आजादी के समय हिन्दू धर्म के अलवॉं सभी धर्मो की जनसंख्या 5% से कम थी जो कि आज मुस्लिम समुदाय आज 18% से ज्यादा है।
न्यायालय के इस आदेश के बाद यह तय हो जाता है कि मुस्लिम समुदाय जो पिछले कई दशकों की अल्पसंख्यक सुख भोग रहे थे वह अब नही भोग पायेगें।
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मुलायम हमारी चड्डी है
आजकल के दौर मे टीवी मे एक चड्डी मे एक युवक पूंरे देश में दिखता है, कोई और कारण नही है सिर्फ अपनी चड्डी की वजह से एक लड़की उस पर फिदा भी हो जाती है। शायद विज्ञापन मे चड्डी की ताकत का एहसास दिलाने की कोशिस किया जाता है कि देख बेटा चड्डी मे कितना दम है? चड्डी तो एक फैशन हो गया है तरह तरह की कलात्मक चड्डियॉं बाजार मे आ रही है, कुछ तो ऐसी है कि पहनो न पहनों बराबर है, उनकी ही मॉंग बाजार मे ज्यादा है लोगों कि सोच होगी मै इसमे कैसा लगूँगा? मुझे भी इस तरह के अंडरवियर मे देख कर मेरी प्रेमिका टीवी वाले की तरह किस करेगी।
उत्तर प्रदेश के चुनाव में चड्डी और भी महत्वपूर्ण हो जायेगी क्योकि मुलायम हमारी चड्डी जो ठहरा, भाई आप ही विचार कीजिऐ कोई अपनी सबसे मुलायम चड्डी का विरोध कैसे कर सकता है। चुनावों मे च ड्डी की भूमिका काफी बढ़ गई है हाल मे आयोजित एक चड्डी समारोह मे प्रदेश के मुखिया ने अगली बार सत्ता मे आने पर प्रत्येक नागरिकों को मुफ्त चड्डी देने की घोषणा की है, धोषणा के ट्रायल के रूप मे इस चुनाव मे पार्टी कार्यकर्ता को चुनाव प्रचार के दौर केवल अण्डवियर मे ही रहने के निर्देश जारी किये गये है। इस चुनाव के लिये कुछ नमूने के रूप मे कुछ अण्डरवियर रखें गयें है। जो पार्टी के कार्यकर्ताओं की इइसव च्छा के अनुसार दिये जायेगे। यहॉं धोषणा पत्र मे कुछ चुनिन्दा चड्डी ही रखी गई है। कुछ खास माडल के अण्डर वियर केवल कार्यलय मे ही उपलब्ध है क्योकि इनके चित्र धोषण पत्र मे छापने से चुनाव आचार संहिता का उलंघन माना जाता । चुनाव कार्यालय अर्थात मुलायम अण्डरवियर केन्द्र है जहॉं पर कार्यकर्ता अपने मन की अन्य डिजायन की उपलब्घ है।
Apr 4, 2007
विन्डोज लाइव राइटर का प्रयोग
काफी दिनों पहले इसके बारे मे सुना था और और प्रयोग करने की कोशिस भी किया किन्तु सफलता नही मिला। आज प्रात: श्री अफलातून जी ने फिर से इसके बारे मे बताया और मै इसका प्रयोग करने की ओर अग्रसर हुआ। आज यह पहला लेख इससे डालने जा रहा हूँ अभी सफलता की आशा कम ही है।
आज अफलातून जी ने बताया कि इसमे ऑफ लाइन लिखकर आप अपने लेख को अपने ब्लाग पर डाल सकते है। यही देखने का प्रयास कर रहा हूँ कि यह चमत्कार होता है कि नही। मै अक्सर आँन लाइन होकर लेख लिखता हूँ और बिना पढ़े उसे पोस्ट कर देता हूँ। जिसके कारण मेरे लेखों मे व्याकराणात्म अशुद्धियॉं देखने को मिलती है। लाइव राइटर के कारण अब इस प्रकार की अशुद्धियॉं कम देखने को मिल सकती है।
पहले तो मै अक्सर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर लिख कर अपने ब्लाग पर जा कर पेस्ट कर देता था इससे भी गल्तियॉं कम होती थी।
ठीक है अब मै इसे पोस्ट करने का प्रयास करता हूँ देखता हूँ कि यह होता है कि नही ।
Apr 3, 2007
एक भीनीं सी मुस्कान और भगवान के प्रति धन्यवाद
मै प्रतापगढ़ जा रहा था एक रेलवे क्रासिंग पड़ती है उस समय अमृतसर से हाबड़ा जाने वाली ट्रेन का समय था। फाटक बंद था। मै भी गाड़ी से उतर कर रेल को देखने पटरी की ओर चल दिया तभी देखता हूँ कि एक कुत्ता रेल की पटरी पर दौड़ रहा था उसके पीछे ट्रेन थी ट्रेन से भी तेज दौड़ने के प्रयास मे कुत्ता और तेज दौड़ रहा था पर पर वह कुदरत की चाल से ट्रेन को पछाड़ पाने में असमर्थ था। ट्रेन का अगला हिस्सा आगे कि ओर कुछ ज्यादा झुका होता है ट्रेन से पहले कुत्ते का एक टक्कर मारी और कुत्ता नीचे की ओर लेट गया हो सकता हो पीड़ा के मारे ही क्यों न हो फिर बचने की प्रयास में खड़ा होता है और फिर वह डिब्बों के नीचे भाग से टकराया और फिर लेट गया। ट्रेन की गति इतनी तेज थी कि तीसरी बार जब वह उठा तो ट्रेन जा चुकी थी और और वह पूर्ण रूपेण जीवित था। पर चोट तो लगी ही थी। जैसा कि मैने इस दृश्य का देखने वाला पहला शक्स था मेरे तो रोगटें खड़े हो गये। मेरे मन ईश्वर से बस इतनी ही प्रार्थना थी कि वह बच जाये। कहते है कि भगवान से कुछ सच्चे हृदय से माँगों तो भगवान कभी इनकार नही करते और आज प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिला। मेरी निगाह एक टक कुत्ते पर पर थी और वह लगड़ाते हुऐ जा रहा था। मेरे साथ वह कई दर्जन लोगों के मुख पर एक भीनीं सी मुस्कान और भगवान के प्रति धन्यवाद देखने को मिल रहा था। मै भी अपने गन्तव्य की और चल दिया।
Apr 2, 2007
पढ़ोगें तो मूर्ख बन जाओंगे के साथ कुछ गम्भीर प्रश्न
आज अप्रेल फूल दिवस है, यानि अंग्रेज भाईयों ने हम भारतीयों के लियें मूर्ख बनाने का दिन भी दिन भी निर्धारित कर गये है। मै इस दिवस को नही मानता हूँ, पर देशी हवा के बयार मे मूर्खाता का ऐसा प्रचलन हुआ है कि मै सोचने को मजबूर हूँ कि क्या इसकी भी आवाश्यकता ?
यह हमारी तुच्छ मानसिकता की सोच है कि हम न्यू इयर, वैलेंटाइन डे, अप्रेल फूल डे, जैसे अन्तार्राष्ट्रीय दिवस तो जो शोर से मनाते है। किन्तु हम कुछ अन्य इनसे भी ज्यादा महात्वपूर्ण दिवस क्यो भूल जाते है। मै पाश्चात संस्कृति अपनाने का विरोधी नही हूँ , विरोधी हूँ तो पाश्चात संस्कृति की गंदगी अपनाने का।
जब हम न्यू इयर, वैलेंटाइन डे, अप्रेल फूल डे मनाते है तो मनाऐ किन्तु हमने विश्व मातृ दिवस, विश्व पितृ दिवस, विश्व संगीत दिवस, विश्व फोटों ग्राफी दिवस, चिक्तिसक दिवस, पत्रकारिता दिवस, विश्व थ्रियेटर दिवस, अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस, अन्तार्राष्ट्रीस प्रेस स्वतन्त्रता दिवस, विश्व श्रमिक दिवस, विश्व विरासत दिवस, राष्ट्रीय युवा दिवस, विश्वमितव्ययिता दिवस, विश्व खाद्य दिवस और विश्व मांसाहार दिवस की ओर कभी ध्यान दिया ?
मैने यहॉं पर जिनते भी दिवस गिनाऐ है, उन सभी दिवसों का सम्बन्ध किसी ने किसी हिन्दी चिठ्ठाकार से अवश्य है। पर शोक और क्षोभ का विषय है कि कोई भी कभी भी इन सर्वाधिक मत्वपूर्ण दिवसों पर न तो कभी लिखा ही न ही बधाई का आदान प्रदान हुआ।
क्या हमने पाश्चात गंदगी को एकत्र करने का ठेका ले रखा है ? यह सोचनीय विषय है। आज मै नारद पर गया तो चारों दिशाओं मे मानवता के हत्यारे जार्ज बुश का चेहरा नजर आ रहा था। जैसा कि मुझे अनुमान तो था कि आज मूर्ख दिवस है पर इसे देख कर पक्का यकीन भी हो गया है। एक दो लेख को देखा तो मजाक मय ही महोल था। फिर मुझे लगा कहीं सभी के चिठ्ठे पर मूर्ख बनाने का अभियान न चल रहा हो। और कही किसी पर टिप्प्णी किया तो मूर्ख की श्रेणी में न खड़ाकर दिया जाये।
मैनें आज के दिन के सारे लेख जिनकी हेडिग नारद पर थी सभी एक साथ एक सामान्य सा वाक्य ( को पढ़ोगें तो मूर्ख बन जाओंग) जोड़ कर पढ़ना चालू किया तो
ग़ज़लें और कविताएँ इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
कविता सीखो हे कविराज… इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
धर्म के नाम पर - को पढ़ोगें तो मूर्ख बन जाओंगे
आरक्षण : चाहिये ही चाहिये को पढ़ोगें तो मूर्ख बन जाओंगे
कादम्बिनी कार्यकारी सम्पादक श्री विष्णु नागर की क़लम से इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे! े
एप्रिल वाला फ़ूल के फल इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
सोवियत संघ में नेताजी के साथ क्या हुआ? इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
गूगल टीआईएसपी: ब्रॉडबैंड दा बाप इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
शर्त सिर्फ़ एकः हिन्दी में लिखो (प्रतियोगिता) इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
फुरसतिया बोले हमहू साइट बनैबे… इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
यह कदम्ब का पेड़ इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
न्यायपालिका पर ताला क्यों नहीं लगा देते? इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
सौ चूहे खाकर चले अर्जुन सिंह हज करने इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
अप्रेल-फूल इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
आरक्षण : आ....क थू इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
हिटलर से बड़ा तानाशाह राहुल गांधी इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
Super Hot & Sexy Angelina Jolie !!! इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
Bunch of Jokers?…..really? इसे पढ़ोगे तो मूर्ख बन जाओगे!
आगे और भी है और आप को पढ़ोगें तो मूर्ख बन जाओंगे लगा कर पढ़ सकते है। अब आप खुद सोचिये कि कौन आज लेख पढ़ कर मूर्ख बनना चाहेगा।
एक बात तो मुझे समझ मे आती कि जो लोग दूसरे सचेत लोगों को मूर्ख बनाने मे लगे होकर हँसते है वे उसने बड़े मूर्ख है जो वास्तव मे मूर्ख होते है।
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