Jul 19, 2007
चिट्ठाकारों अलविदा
नमस्कार,
आज समय आ गया है मेरा इस परिवार से विदा लेने का, आप लोगों ने एक साल तक मुझे अपना प्यार और आशीष दिया इसके लिये धन्यवाद।
लेखन का कार्य करना तब तक ठीक है जब तक कि अर्न्तात्मा आपको लिखने के लिये प्रेरित करे। मुझे लगता है कि अब मेरे अन्दर की अर्न्तात्मा की मार डाली गई है। जब अर्न्तात्मा की हत्या हो जाये तो निश्चित रूप से लेखन की कसौटी पर खरा नही उतरता है।
मै पिछले कई दिनों से अपने आपको ''विवादों की लोकप्रियता'' के पैमाने का खरा और सही बात न कह पाने के कारण मानसिक रूप से अशान्त महसूस कर रहा हूँ। और इस अशान्ति के कारण आत्मा प्रवंचना के के अवसाद के ग्रस्त महसूस कर रहा हूँ।
मैने इस सम्बन्ध में कई मित्रों से राय लेनी चाही कि शायद अब मेरी विवादों के प्रति दिक्कतों के प्रति यह परेशनियॉं खत्म होगीं किन्तु उन मित्रों से भी सहयोग नही मिला या तो वे ही नही मिलें।
मै यह निर्णय लेने के लिये कई महीनों से जद्दोजहद कर रहा था कि क्या यह करना ठीक होगा? पेरशानियों के आगे चिट्ठाकारिता के जज्बात आगे आ जाते थे। और मुझे अपने फैसले से पीछे हटना पड़ता था। पर आज मै पूरे मूड से हूँ, मै जानता हूँ कि जो मै करने जा रहा हूँ निश्चित रूप से न्यायोचित नही है किन्तु कभी कभी न्याय का भी अतिक्रमण करना पड़ता है।
यह कदम उठाने के लिये मै अपने आप को स्वयं दोषी मानता हूँ। कि मै लगभग सभी के बातों पर विस्वास कल लेता हूँ और लोग मेरा उपयोग आपने आपना काम निकलने मे करते है। और काम हो जाने के बाद दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल का फेक देते है।
इधर कुछ दिनों पूर्व देखने में आया था कि कुछ चिट्ठाकारों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से महाशक्ति का बहिस्कार किया जा रहा था और इसकी छाप निश्चित रूप से चिट्ठाचर्चा पर प्रत्यक्ष रूप से दिखती है। मै पहले भी कह चुका हूँ कि किसी चिट्ठे की चर्चा करना या न करना चिटृठाकार का मौलिक हक है किन्तु किसी चिट्ठे को लगातर निगलेट करना बहिस्कार नही तो क्या है?
विवादों की लोकप्रियता के दौर मे मेरे हितैसी होने का दावा करके मेरी चैट को खूब सार्वजनिक किया गया और मेरे मेलों को मेरी अनुमति के बिना दूसरे को पढ़ाया गया। दूसरों के लिये तो यह कार्य कार्य चिट्टाकारिता के पैमाने के विपरीत है और स्वयं के लिये अनुरूप हो जाता है।
विवदों के दौर में कई लोगों ने मुझे आड़े हाथ लेने का प्रयास किया किन्तु वे भूल जाते है वे भी पाक साफ नही है। मै स्वयं काजल की कोठरी मे बैठा हूँ कि साफ दिखने का दावा नही करता किन्तु कुछ लोग ऐसे है जो अपनी गिरेबान में झाक कर देखें तो पता चालेगा कि सफेद पोश की आड़ मे कितनी मैल जमी है।
मै जैसा था वैसा ही रहूँगा निश्चित रूप से मै गलत काम को बर्दास्त नही कर सकता। और जब तक यहॉं रहूँगा निश्चित रूप से अन्याय और गलत काम का सर्मथन नही करूँगा। और मेरे इस कदम से निश्चित रूप से कई लोगों को काफी कष्ट पहूँचेगा।
मै दुनिया बदले की सोच रहा था पर मै न तो गांधी हूँ और न ही एडविना का दिवाना नेहरू जिसके पीछे दुनिया चल देगी। दुनियॉं नही बदलेगी मुझे ही बदलना होगा। और आज मै इस हो अपना पहला कदम उठा रहा हूँ। निश्चित रूप से मेरे लिये यह कदम उठाना आसान नही था किन्तु कभी कभी कड़े फैसले लेने ही पड़ते है।
मै सभी एग्रीगेटरों से भी निवेदन करता हूँ कि वे इस ब्लाग को अपने एग्रीगेटर से हटा दे। इस पोस्ट को ही मेरा अन्तिम निवेदन समझा जाये। सभी चिठ्ठाकर भइयों से भी निवेदन है कि वे मेरे ईमेल को अपनी लिस्ट से हटा दे, अब मै हिन्दी ब्लागर नही रहा। आगे से महाशक्ति पर कोई लेख नही लिखा जायेगा।
सच मे आज यह सब लिख कर मै सुकून और शान्ति महसूस कर रहा हूँ। लग रहा है कि मैने आज कोई काम स्वविवेक से किया है। कम से कम अब विवादों की लोकप्रियता का अन्त होगा और चिट्ठारिओं पर आरोप तो न लगेगें।यहॉं मेरा दम घुट रहा था अब खुली हवा अच्छी लग नही है।क्योकि ब्लागिंग के अलावा भी बहुत काम है।
सच में दुख तो हो रहा है कि एक प्रिय गीत आपके और मेरे दुख को कम करेगा .............
बहार ख़्हतम हुई, दिल गया ख़ुशी भी गई
वो कया गये के मोहब्बत की ज़िंदगी भी गई
(चले दिल की दुनिया जो बरबाद कर के
बहुत रोएँगे उनको हम याद कर के)-२
किसी तरह आता नहीं चैन दिल को
ना ख़ामोश रह के ना फ़रियाद कर के
बहुत रोएंगे उनको हम याद कर के
चले दिल की दुनिया जो बरबाद कर के
बहुत रोएँगे उनको हम याद कर के
अरे ओ मेरे दिल के दुशमन ज़माने
तुझे कया मिला मुझ को बरबाद कर के
बहुत रोएंगे उनको हम याद कर के
चले दिल की दुनिया जो बरबाद कर के
बहुत रोएँगे उनको हम याद कर के
ख़ुशी दे के तक़दीर ने दे दिया ग़म
किया क़ैद क्योँ मुझ को आज़ाद कर के
बहुत रोएँगे उनको हम याद कर के
चले दिल की दुनिया जो बरबाद कर के
बहुत रोएँगे उनको हम याद कर के।
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Jul 15, 2007
इलाहाबाद की पहली ब्लागर भेंटवार्ता - महाशक्ति- हिन्दयुग्म नही थी
मै, माता जी, अमिताभ जी, शशि भाई,,देवेन्द्र भइया, राजकुमारइस ब्लागर भेंट वार्ता का स्वरूप कुछ इस प्रकार सकार हुआ। एक दिन मेरे पास अचानक शशि भाई का ईमेल आया कि
"कि प्रमेन्द्र आने वाली 9 फरवरी को हम आपके इलाहाबाद मे होगें तुमसे मिलकर अच्छा लगेगा। कृपया अपना सम्पर्क सूत्र दो तुमसे मिलूँगा।
मै भी इस ईमेल को पढ़कर प्रसन्न था कि कोई मुझसे मिलने आ रहा है। मैने भी जल्दी में अपना लैन्डलाईन नम्बर और पता ईमेल कर दिया, पर मुसीबत आती है तो घेर कर आती है। जब 9 तारीख आई तो मेरा लैन्डलाइन खराब था। सुबह से लेकर दोपहर तक इन्तजार करता रहा कोई ही आया और फोन का तो आना नामुमकीन था। फिर मैने दोपहर में शशि भाई को फोन किया और शाशि ने कहा हैलो, मैने कहा मै प्रमेन्द्र आप मुझसे मिलना चाहते थे( जबकि मिलना तो मै चाहता था) शशि भाई ने भी जोरो खरोश के साथ मेरा अभिवादन किया और मुझे एक पता देकर वहॉं बुलाया कि क्या आप आ सकते हो ? चूकिं समयाभाव था और मैने जाने में असर्मथता व्यक्त कर दिया। बस फिर क्या था? इलाहाबाद की पहली ब्लागर भेंट वार्ता आयोजन से पहले ही दम तोड़ने जा रही थी।
शाम आते आते होनी को जो मंजूर था वह होने जा रहा था, शायं काल मुझे पिता जी ने एक जगह जाने को कहा, जब जगह का नाम सुना तो मेरी बाछें खिल गई। जो जगह शशि भाई ने बताई थी उसके पास ही पिताजी वाली जी जगह थी। तो फिर क्या था ? मेरे पास गाड़ी था, ड्राइवर और मेरा खास मित्र राजकुमार था। हम लोग पहूँच गये शाशि भाई से मिलने। जब पहुँचे तो वहॉं का रंग कुछ दूसरा था जहॉं एक ब्लागर से मिलना असंभव लग रहा था वहीं दो दों ब्लागरों से भेट हो रही थी। शशि भाई के साथ अमिताभ त्रिपाठी जी भी थे। फिर क्या था जम कर चर्चा हुई।
बातों ही बातों में कुछ देर बाद शाशि जी ने कहा कि मुझे नार्दन इण्डिया पत्रिका के कार्यालय में कुछ काम है। फिर शशि भाई को लेकर हम लोग पत्रिका कार्यालय लेकर गये और मेरे दीमाग की चक्करगिन्नी चली और गाड़ी में बैठाकर उन्हे बिना बताऐ अपने घर ले आये जबकि उनका मेरे घर पर आने का कोई प्रोग्राम नही था। सीधे घर पर पहुच कर उन्हे थोड़ा अजीब सा लगा किन्तु पहुँचने के बाद वे कर ही क्या सकते थे। मैने उन्हे उन्हे घर में बैठाया किन्तु वे बैठते थे वे जाने की जल्दी कर रहे थे। मै भी मै था मै भी बिना खतीरदारी किये उन्हे कैसे जाने देता ? मैने शशि भाई से कहा कि आपने चाय तो बहुतों पी होगी किन्तु एक ब्लागर की हाथ की बनी चाय पहली बार पीयेगे। शशि भाई भी राजी हो गये। चूकिं चाहे सुबह हो शाम चाय बनाना होता है मेरा काम।
मै चाय बनने गया तो मेरे भइया, माता जी और मित्र शशिभाई और अमिताभ जी से बाते कर रहे थे। चाय तैयार करके लाया और सबको पिलायी, शशि भाई चाय और मेरी जम के तारीफ की। फिर शशि भाई ने पिताजी से मिलने की इच्छा जाहिर की किन्तु वे अपने आफिस में काम मे व्यस्त थे। मैने उन्हे कहा कि मै उन्हे सूचना दे देता हूँ कि आप मिलना चाहते है फिर पिताजी आये। फिर मै शशि भाई को उनके गन्तव्य तक छोडने गया और धीरे धीर सभा विसर्जित हो गई। शशि भाई आपनी गाड़ी से पूर्व तो मै पश्चिम की ओर चल दिया पर कुछ देर बिताई गयी छवियॉं आज जी आखों से सामने नाच रही है।
बताइऐ आप कब आ रहे है ? मेरी हाथ की बनी चाय पीने :)
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Jul 10, 2007
अफलातून जी अपना उत्तर ले लीजिए
अफलातून जी ने कुछ प्रश्न आपने ब्लाग पर महाशक्ति के नारद के द्वारा की गई कार्यवाही के सर्मथन पर छोडे थे उन्ही के उत्तर प्रेषित कर रहा हूँ।
पहले आपनी फटी में पैबन्द लगाईये तब मुझे सलाह दीजिऐ कि मैने कौन सा गीत सुना है अथवा कौन सा नही? व्यक्तियों में आम धारणा होती है कि अपनी फटे कपड़े तो नही दिखते और वे लोग दूसरे को देख कर हँसते और कटाक्क्ष करने का प्रयास करते है, ठीक वैसी ही छवि मुझे आप में दिखती है जो दूसरों में तो विसगतियों को खोज खोज कर खुश होते है फिर उनका कुगान करते है। यह करते हुऐ आप यह भूल जाते हो कि जो काम आप कर रहे हो वही कोई दूसरा आपकी फटी देख कर मन मन मुस्करा लेता है ठीक इसी तरह :) पर आपकी तरह बखान नही करता। ऐसा नही है कि आरएसएस की ही फटी है और समाजवाद की पाक-साफ।
जिस प्रकार आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे बहुत दोष देखते है अगर उसका 10 प्रतिशत भी ढोगी समाजवाद के प्रति सोचा होता तो न ही देश की यह स्थिती होती और न ही आपकी। जिस समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष है बताइये कि कितना प्रतिशत वोट मिले आपकी पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनाव में, जमानत भी बची कि नही? जितना समय आप हाफ पैन्ट वालों को कोसने में लगाते है उतना समय अगर अपनी फटी खादी(अपनी पार्टी) की मरम्मत में लगाइये।
अगर पहले चिठ्ठाकारिता में बहस हुई है तो प्रमाण दीजिऐ और अगर हुई भी होगी तो इतनी भी घृणत्मक नही हुई होगी मै इस बात की दावे के साथ कह सकता हूँ कि चर्चा का स्तर उच्च ही रहा होगा।
सच मे कहूँ तो आप में से हाफ पैन्ट वालो से जलन होने बू आती है कि देखो ये हाफ पैन्ट वाले कितने आग चले जा रहे है और हम समाजवादी झुनझुना ही बजाते चले जा रहे है। सही यह जलन तो होन स्वाभाविक है क्योकि आप भी एक सामान्य मनुष्य ही तो है।
बहुत कम लोग होते है जिन्हे निन्दा पंसद होती है जैसा कि आपकी दिल्ली यात्रा के दौरान आपके कुर्ते को लेकर आक्षेप किया गया तो आपको खराब लगा था। इसके एवज में एक लम्बी पोस्ट लिख डाली आपने।
और रही बात आर एस एस के प्रति मेरी जिम्मेदारी की तो उससे अभी अधिक आपका उत्तर दायित्व है आपके समाजवादी जनपरिषद के प्रति जिसकी स्थिति से आप हमें आपने धोषणा पत्र से खुद ही बखान कर चुके है। अब लगता है कि ज्यादा कहना ठीक न होगा। और आशा है कि न ही आप मेरे उत्तर से व्यथित होगे और न ही मेरी बाते आप पर नगवार गुजरेगी। क्योकि काफी लोगों ने स्वीकार किया है कि प्रमेन्द्र की बाते काफी नागवार गुजरी। किसी पर कीचड़ उछलने से पहले अपने दामन को झकना जरूरी होता है किन्तु कई लोग ऐसा नही करते। और दूसरो पर कीचड़ उछलते है पर वे भूल जाते है कि जो कीचड़ वे दूसरों पर उछलने के लिये उठाते है वह पहले उनके हाथ को ही गन्दा करता है। आज मैने भी यही काम किया कि कुछ कीचड़ उठाया किन्तु सफाई करने के लिये कीचड़ को हाथ लगाना जरूरी था। समय है कि दूसरे संगठनों के बारे लंछन लगाने के तो इससे अच्छा कि अपने संगठन की अच्छाई को बताऐं।
आशा है कि इन बातों से मेरे आपके सम्बन्ध पर कोई असर नही पडेगर किन्तु अब चाहे सम्बन्ध अच्छे हो खराब, अच्छाई दोनों मे समान होगी।
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Jul 8, 2007
इलाहाबाद के ब्लागर ध्यान दें
प्रिय मित्रो,
सादर नमस्कार!
आपको सूचित करते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि इलाहाबाद में हिन्द-युग्म के शैलेश भारतवासी आये हुऐ है, जो दिनाँक 10-7-2007 की शाम 5 बजे तक उपलब्ध रहेगें। शैलेश जी इलाहाबाद और उसके आस-पास के सभी ब्लागारों से मिलनें कों इच्छुक है। इलाहाबाद से चिट्ठाकारी करने वाले लोगों की संख्या किसी भी महानगर से कम नहीं है। दिल्ली, बेंगलूर, पुणे, मुम्बई में ब्लॉगर-मीट होते रहे हैं। आइए हम इलाहाबादी भी एक ब्लॉगर-मीट का आयोजन करते हैं। 14 जुलाई, 2007 को नई दिल्ली में होने वाली ब्लॉगर-मीट से पूर्व इलाहाबाद के ब्लॉगरों की आवाज़ को शैलेश भारतवासी उस अंतर्राष्ट्रीय सभा में रख सकते हैं। समय के अभाव के कारण, या अधिक दूर होने के कारण हममें से कई लोग उस सभा में सम्मिलित नहीं हो पा रहे हैं। जबकि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से जुडे इलाहाबादी चिट्ठाकारों की संख्या बहुत है, आइए मिलकर अपनी आवाज़ अनुगुँजित करें।
शीघ्र-अतिशीघ्र मेरे ईमेल पते (pramendraps@gmail.com) या मेरे फ़ोन नं॰ 0532-3257319 पर सम्पर्क करें।
धन्यवाद।
आपका
प्रमेन्द्र प्रताप सिंह
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नारद जी आप पुन: बधाई के पात्र है ..
काफी दिनों से व्यस्त था और कह नही पा रहा था किन्तु आज समय आ गया है कि यह बात भी आपके सामने रखी जाये। उस सर्मथन भरी साहसी पोस्ट का परिणाम यह हुआ कि मेरे पास एक मेल आया।
मै हिन्दी ब्लाग का काफी सक्रिय ब्लागर हूँ, तथा मै आपकी निर्भिकता और सच्चाई देख कर काफी अहलादित हूँ। तथा चाहता हूँ कि आप मेरे साथ विवाह का प्रस्ताव स्वीकार करें। मै आपका का हार्दिक आभारी रहूँगीं। आप चाहें तो आपने परिवार जन से बात कर या मेरी बात हमारी करवा सकते हो। मै आपना चित्र भेज रही हूँ। तुम्हारी शुभ चिन्तक एक हिन्दी ब्लगर
मै भी आश्चर्य में था कि यह क्या हो रहा है? यह सब मेरे समझ के परे था। फिर मैने भी काफी सोच समझ का जवाब दिया -
आदरणीय महोदया सादर नमस्कार मैने आपके प्रस्ताव को पढ़ा काफी प्रसन्न और आश्चर्य में हूँ। कि नारद के सर्मथन के यह भी परिणाम हो सकता है। आप गलत फहमी में कि कि मै विवाह योग्य हूं। मेरी उम्र इस समय विवाह योग्य नही है अत: आप किसी अन्य वर की तलाश करें। आप मेरी बातों से मेरी उम्र का अनुमान लगा पाने में असफलता प्राप्त की है। भारतीय कानून के अर्न्तगत 21 साल से पहले विवाह करना कानूनन जुर्म है।अत: आपसे निवेदन है कि मेरी तरफ से इस प्रस्ताव को वापस समझे। एक बात और जैसा कि आपने ने नारद के सर्मथन के कारण और मेरी जुझारू पोस्ट के कारण यह कदम उठाया है, तो मै एक सलाह देने की दृष्टता करना चाहूँगा। मेरी नारद के प्रति समर्थन के पोस्ट के ठीक पहले मेरे एक मित्र गिरिराज की भी एक जोशिली जुझारू पोस्ट आई थी। जिसमें उन्होने लेख में और फिर लेख के बाद टिप्पणी के काफी जोश खरोस के साथ मोहड़ा लिया था। मै यह भी स्पष्ट कर दूँ कि जिस प्राकर नारद के गिरिराज ने प्रथम बार अपना खुला सर्मथन दिया। और पहली बार में ही सबको अपने विरोधी उग्र स्वाभव से परिचय करवाया। आपको जो खूबी मुझमे दिखती है निश्चित रूप से गिरि में कई गुना खूबियॉं है। वह मेरी तरह मेरे श्रेष्ठ कवि है, तो अब एक श्रेष्ठ जवाव देने वाले शक्श भी बन गये है। अत: मुझे लगता है कि गिरिराज जी से अच्छा विकल्प आपको नही मिलेगा। एक विकल्प आपके सामने और है श्रीष जी व प्रतीक जी किन्तु मै उसके लिये आपको राय नही दूँगा क्योकि उनके उनके अन्दर जुझारू पन तो है किन्तु कवि नही है। आगर आपकी इच्छा हो तो मुझे सूचित करने का कष्ट करें। मै मध्यस्ता करने को तैयार हूँ। आप मुझे सूचित करें।
उस स्त्री ब्लागर की तरफ से मेल आया कि ----
प्रमेन्द्र जी मै क्षमा चाहूँगीं कि मुझे आपको पहचाने में भूल हुई। मुझे आपकी उम्र का अन्दाज ही नही लगा पायी। मै आपकी राय से सहमत हूँ, गिरिराज जी मुझे पंसद है, प्रतीक जी और श्रीश जी भी चल सकते है, बात रही कविता की तो मै विवाह के बाद कविता करना सिखा ही दूँगी। मै आप को अपने विवाह के लिये अधिकृत एजेंट धोषित करती हूँ। कि आप गिरिराज जी बात करें और उन्हे प्रस्ताव भेजे साथ ही उनकी एक नवीनतम फोटों भी अच्छा रहेगा।
मैने उत्तर दिया
हॉं मै ऐसा करता हूँ अगर गिरिराज जी से बात सफल नही होती है तो अन्य विकल्प पर भी नजर रखूँगा। शेष कुशल
गिरिराज जी को पत्र
मित्र मेरे पास एक आपके लिये एक विवाह प्रस्ताव आया है, जो आपके नारद वाले लेख से काफी प्रभावित है। अगर आपको यह प्रस्ताव स्वीकार हो तो मेरे पास एक आपनी फोटो भेज दीजियें। आपका शुभकाक्षी व विवाह का प्रस्तावक प्रमेन्द्र
गिरिराज जी का उत्तर

मित्र ही मित्र के काम आतें है
जिनकी शादी न होती हो,
वे उनकी भी शादी करवाते है।
मै आपके प्रयास से काफी खुश हूँ,
और सच्ची मित्रता की बधाई देता हूँ।
मै उस प्रस्ताव को करना हूँ स्वीकार,
और भेज रहा हूँ अपनी तस्वीरें चार,
आशा करता हूँ वो कर लेगी स्वीकार।
मित्र मै कैसे करूँ आपका धन्यवाद,
जो रखा आपने इस समय मुझकों याद।
देता हूँ वचन मै भी मित्रता निभाऊगा,
समय आने पर आपकी भी शादी करवाऊँगा।
गिरिराज जी के उत्तर के पश्चात बात पक्की हो गई, और आगें की प्रक्रियॉ चालूँ हो चुकी है जल्द ही आपको शुभ सुचना मिलेगी। प्रतीक जी और श्रीश जी आशा है आप बुना नही मानेगें। अत: आप भी इस निर्णय को स्वीकार करें और पहले ब्लागर सगाई के घराती और बराती होने का सौभाग्य प्राप्त करें।
इसी के साथ नारद जी पुन: बधाई के पात्र है कि उनके कारण एक ब्लागर का परिवार बस रहा है। इसी विश्वास के साथ नारद जी को सर्मथन जारी रहेगा, हो सकता है कि ............।
इस तरह महाशक्ति की 100वीं पोस्ट बोले तो शतक पूरा होता है। अत: भूल-चूक लेनी देनी।
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