Sep 23, 2008

रामधारी सिंह ''दिनकर''


छायावादी कवियों में प्रमुख नामों में रामधारी सिंह दिनकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। 23 सितम्बर 1908 को बिहार के मुगेर जिले सिमरिया नामक कास्बे में हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से इन्‍होने स्‍नातक बीए की डिग्री हासिल की और तत्पश्चात वे एक सामान्‍य से विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गये। रामधारी सिंह दिनकर एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कवि के रूप में जाने जाते थे। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्रृंगार के भी प्रमाण मिलते है।

दिनकर जी को सरकार के विरोधी रूप के लिये भी जाना जाता है, भारत सरकार द्वारा उन्‍हे पद्मविभूषण से अंलकृत किया गया। इनकी गद्य की प्रसिद्ध पुस्‍तक संस्‍कृ‍त के चार अध्याय के लिये साहित्‍य अकादमी तथा उर्वसी के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। 24 अप्रेल 1974 को उन्‍होने अपने आपको अपनी कवितों में हमारे बीच जीवित रखकर सदा सदा के लिये अमर हो गये।

दिनकर जी विभिन्‍न सकरकारी सेवाओं में होने के बावजूद उनके अंदर उग्र रूप प्रत्‍यक्ष देखा जा सकता था। शायद उस समय की व्‍यवस्‍था के नजदीक होने के कारण भारत की तत्कालीन दर्द को समक्ष रहे थे। तभी वे कहते है –

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

26 जनवरी,1950 ई. को लिखी गई ये पंक्तियॉं आजादी के बाद गणतंत्र बनने के दर्द को बताती है कि हम आजाद तो हो गये किन्‍तु व्‍यवस्‍था नही नही बदली। नेहरू की नीतियों के प्रखर विरोधी के रूप में भी इन्‍हे जाना जाता है तथा कर्इ मायनों में इनहोने गांधी जी से भी अपनी असहमति भी जातते दिखे है, परसुराम की प्रतीक्षा इसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण है । यही कारण है कि आज देश में दिनकर का नाम एक कवि के रूप में नही बल्कि जनकवि के रूप में जाना जाता है।  

Sep 21, 2008

पंगेबाज जी महाशक्ति के शहर में

आज का दिन हमारे लिये काफी अच्‍छा रहा, हुआ यूँ कि अक्सर क्‍लास के समय मै अपने मोबाईल को या तो नही ही ले जाता हूँ या तो स्‍वीच्ड आफ कर देता हूँ,  पर ऐसा कल मै नही कर सका। पौने सात बजे के आसपास मेंरे पास कॉल आती है, जिसमें बड़े बड़े अक्षरों में पंगेबाज लिखा हूँआ था, इस प्रकार की काल अकारण नही आती थी। काफी दिनों से न‍ेट पर दूरी के कारण उनसे मेरी बात नही हो सकी थी, अचानक फोन जाने से खुशी का ठिकाना नही था, मै क्‍या बोलूँ मुझे समझ नही रहा था। उन्होने कहा कि मै कल आपके शहर मे रहूंगा। यह जानकर और भी खुशी हुई। उन्‍होने कहा कि मैने तुम्‍हे ईमेल किया था किन्‍तु तुम्‍हारा कोई उत्तर नही आया मैने अपनी समस्‍या बता कर रात में दोबारा बात करने की अनुमति लेकर मैने वार्ता समाप्त किया। 

रात्रि 9.30 बजे मैने बात किया और यात्रा का सम्‍पूर्ण विवरण लिया, पता लगा कि प्रात: 7.00 से 10.00 तक उनका कोई अपना कार्यक्रम नही था तो मैने उस समय को अपने लिये देने का अनुरोध किया, जैसा कि उन्‍होने बात की दौरान यह बताया था कि शायद पूरे दिन उनके पास समय नही रहेगा। उन्‍होने मेरे अनुरोध को सहर्ष स्‍वीकार कर लिया। उनके इतनी बात के बाद मुझे रात्रि में ठीक से नीद नही आयी और सोने में करीब 11.30 बज गये किन्‍तु रोज की बात प्रात: 4.30 पर जगना हो गया। प्रात: काल सबसे पहले उठ कर ईमेल चेक करने बैठ गया शायद कोई अपडेट हो किन्‍तु ऐसा नही था, फिर मैने अपने विश्वविद्यालय की साईट देखी तो खुशी का ठिकाना रहा, क्‍योकि मै परास्‍नतक की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका था, इसे सज्जन के चरणो का इलाहाबाद में आने का प्रभाव कहा जा सकता था। 10 मिनट की देरी के साथ प्रयागराज राईट टाईम थी, और मै स्‍टेशन पर 6.45 पर पहुँच चुका था, सवा सात बजे तक हम लोग घर पहुँच चुके थे, थोडा चाय पानी के पश्चात मैने स्‍नान की बात कही, तो अरूण जी और उनके मित्र ने हामी भरी, स्‍नान के प्रति उत्‍साह को देखते हुये मैने स्‍नान के आगे गंगा शब्‍द और जोड़ दिया तो अरूण जी के मित्र का उत्‍साह देखते ही बन रहा था, इसी के साथ गंगा स्‍नान का कार्यक्रम थी बन गया। 

8.30 बजे तक हम संगम पहुँच चुके थे, और 9.30 बजे तक स्‍नान हो गया, नाव के द्वारा गंगाजी और यमुना जी के धाराओ को एक होते देखा जो एक अद्भुत दृश्‍य था। 10.10 तक हम लोग घर पर गये, और ड्राईवर पापाजी को उच्व न्‍यायालय छोड़ कर चुका था, मैने कहा कि आपको आपके गन्‍तव्‍य तक छोड़ आयेगा, जब पुन: कहेगे तो तो वह आप को ले भी आयेगा किन्‍तु भोजन के बाद अरूण जी ने हमें अपने साथ हमें चलने को कहा तो मुझे काफी अच्‍छा लगा किन्‍तु मै और भइया उस समय तक भोजन नही किये थे, जल्‍दी जल्‍दी में भोजन किया और सामान्‍य घरेलू वेश मै और मेरे भइया, अरूण जी और उनके मित्र करीब 11 बजे चल दिये। 

गन्‍तव्‍य पर पहुँच कर इतनी बड़ी बड़ी मशीनो को नजदीक से देखने का अच्‍छा अनुभव था, उक्‍त स्‍थान का निरीक्षण करते करते हमें 4.30 बज गये थे जबकि श्रीमान ज्ञान दत्त पाण्‍डेय जी ने मिलने का सर्वात्‍तसमय 3 से 5 बजे के मध्‍य था तो अचानक ही उनसे मिलने का कार्यक्रम बनाना पड़ा, समय और परिस्थिति के अनुसार हम जैसे थे वैसे ही वहॉं पहुँच गये। श्रीज्ञान जी के साथ मेरी दूसरी भेंट थी, उन्‍होने बड़ी गर्म जोशी के साथ हमारा स्वागत किया। श्रीज्ञान जी ने पूर्व ही तैयारी कर रखी थी, उनकी पत्नी जी ने श्री अरूण जी के स्‍वागत के लिये सेवई और ढोकला भेजा था, इससे तो हम जान ही सकते है श्रीमती जी भी प्रत्‍यक्ष और परोक्ष चिट्ठाकारी और चिट्ठाकारों में रूचि रखती है। निश्चित रूप से पाडेय जी से मिलना एक अच्‍छा अनुभव रहा। जिस समय हमने श्री ज्ञानजी से अनुमति ली, घड़ी 5.25 बजा रही थी, अर्थात उन्‍होने अपने बेस्‍ट समय से अतिरिक्‍त समय दिया, क्‍योकि 5.30 बजे पर उनकी नियमित मिटिग होती है। प्रणाम, हस्‍तमिलन व अलिंगन के साथ हमने पाड़ेय जी की चम्‍बल विहार से विदा लिये, तथा श्री अरूण जी ने श्री पाड़ेय जी को दिल्‍ली यात्रा के दौरान अपने यहॉं आने का निमंत्रण भी दिया।

 जिस काम के लिये हम सुबह से निकल थे, उसे सम्‍पन करने के बाद हम घर की ओर प्रस्‍थान कर दिये, और इधर-उघर की करना प्रारम्‍भ कर दिया। करीब 6.50 पर हम घर पर थे, सर्वप्रथम मैने चाय के लिये पूछा अरूण जी ने मना कर दिया, किन्‍तु उनके मित्र ने पीने की इच्‍छा जाहिर की, फिर मैने अरूण जी की इच्‍छा की टोह ली तो उन्‍होने कम दूध की चाय की इच्‍छा जाहिर की। मैने डरते हुये ब्‍लैक टी के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि इससे अच्‍छा हो ही क्या सकता है।

वहॉं से लौटने के बाद से ही, अरूण जी मेरे घर से जल्दी प्रस्‍थान की इच्‍छा जाहिर कर रहे थे, जबकि मै उन्हे रात्रि  9 बजे भोजन के उपरान्‍त जाने को कह रहा था किन्‍तु उन्‍होने अपनी बात पर जोर देते हुये, प्रस्‍थान करने की बात मुझसे मनवा ही ली।  7.15 मिनट के आस-पास हमने घर छोड़ दिया, घर छोड़ने से पूर्व अरूण जी मेरे पिताजी से मिले और दिल्‍ली आने पर मिलने निमत्रण दिया। हमारे चलने के बाद अरूण जी ने स्‍टेशन पर ही रूकने और कुछ देर घूमने की बात कही। इस पर मैने कहा कि स्‍टेशन पर आपको घूमने के लिये कुछ नही मिलेगा सिवाय गंदगी के,और आप चाहे तो सिविल लाइंस छोड़ देता हूँ आप अपने आगे के 2 घन्‍टे काफी अच्छी तरीके से घूम सकते है। उन्‍हे भी यह बात जच गई और मैने उन्‍हे काफी हाऊस पर छोड़ कर प्रयाग में अन्तिम प्रणाम लेकर अपने गंत्वय पर चल पड़ा।

सिविल लाइन्‍स में उन्‍हे छोड़ने के बाद, मेरा भी वहॉं से जाने का मन नही कर रहा था, इसे पिछले 12 घन्टो के साथ-साथ रहने का प्रतिफल ही कहा जा सकता है। अत्‍मीयता अपने आप ही हो जाती है। काफी अधूरे मन से मै वहॉ से चल दिया। रात्रि करीब 9.25 पर मैने अरूण जी के पास फोन किया, कि आप स्‍टेशन पहुँच गये है कि नही ? उन्‍होने बताया कि मै स्‍टेशन पहुँच गया हूं और इस समय ट्रेन में विश्राम कर रहा हूँ। कुशलता के साथ स्टेशन पहुँचने की खबर पाकर मन अति प्रसन्न हुआ। रात्रि बीत गई पता ही नही चला, सुबह करीब 6.45 पर मैने हाल लेने की सोची किन्‍तु किसी कारण वश नही कर सका, करीब 9 बजे अरूण जी ने मुझे फोन कर बताया कि मै दिल्‍ली पहुँच गया हूँ।

इस दौरान जिन चिट्ठाकारों की चर्चा हुई उनके नाम निम्‍न है - श्री अनूप शुक्ल जी, श्री समीर लाल जी, श्री अफलतातून जी, श्री ज्ञान दत्त पांडेय जी, श्री संतोष कुमार पांडेय जी, श्री अभय जी, श्री रामचंन्‍द्र शुक्‍ल जी, श्री उन्मुक्त जी तथा बहुत से अन्य ब्‍लाग तथा सम्‍मानित ब्‍लागरों के बारे में चर्चा हुई। अरूण जी की इस यात्रा के सम्‍बन्‍ध में काफी कुछ और भी लिखा जा सकता है, जल्‍द ही फिर लिखूँगा।