Aug 28, 2009

सुदर्शन जी के दर्शन और सदर्शन जी से बात

आज राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के पूर्व संघचालक श्री सुदर्शन जी का आशीर्वाद प्राप्‍त हुआ, इसके साथ ही साथ इलाहाबाद से सबसे सक्रिय चिट्ठो में एक सुदर्शन ब्‍लाग के चिट्ठाकार श्री कृष्‍ण मोहन मिश्र जी से टेलीफोनिक बातचीत हुई। एक साथ दो-दो सुदर्शनों का सानिध्‍य वाकई प्रेरणा दायी और खुशी देने वाला रहा। सबसे पहले संघ के पू. संघचालक श्री सुदर्शन जी से बारे मे लिखना चाहूँगा। आ. सुदर्शन जी को सुनने वकाई मनमोहक था। कार्यक्रम में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के पूर्व महाधिवक्‍ता एवं वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता श्री वीरेन्‍द्र कुमार सिंह‍ चौधरी ''दद्दा दादा'', कानपुर विश्‍वविद्यालय के पूर्व कुलपति व उत्‍तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्‍यक्ष श्रीकृष्‍ण बिहारी पांडेय जी का भी सानिध्‍य भी मिला। कार्यक्रम में क्‍या हुआ क्‍या नही बताने का उचित समय नही है, पोस्‍ट लम्‍बी खीच जायेगी।

घर पहुँचने पर अन्‍य कामो से छूट कर ईमेल चेक किया तो पाया कि एक सुदर्शन ब्‍लाग के श्री मिश्रा जी का ईमेल प्राप्‍त हुआ। उन्‍होने अपना नम्‍बर दिया हुआ, हमने भी मोबाईल उठाया और घन्‍टी बजा दी। आपसे भी बात करके बहुत अच्‍छा लगा, बहुत दिनो से इच्‍छा थी कि आपसे बात हो, वह भी आज पूरी हो गयी। कुछ औपचारिक और कुछ अनौपचारिक बात भी हुई। बात के दौरान उन्‍होने मुझे अपने यहाँ आमंत्रित किया और मैने उन्‍हें अपने यहाँ, फिर हुआ कि जो जहाँ पहले पहुँच जाये।

Aug 27, 2009

दर्दो का बादशाह मुकेश

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आज भारतीय इतिहास के सर्वश्रेष्‍ठ गायको में एक मुकेश कुमार का पुण्‍यतिथि है, मुकेश के बारे में बहुत कुछ बताने की जरूरत नही है। बतौर अभिनेता और गायक 1941 में मुकेश ने निर्दोष में काम किया। लोकप्रिय गायक मुकेश ने निर्दोष के अलावा अभिनेता के रूप में मशूका, आह, अनुराग और दुल्‍हन में बतौर अभिनेता काम किया।

मुकेश द्वारा गाई गई तुलसी रामयण आज भी लोगो को भक्ति भाव से झूमने को मजबूर कर देती है, करीब 200 से अधिक फिल्‍मो में आवाज देने वाले मुकेश ने संगीत की दुनिया में अपने आपको दर्द का बादशाह तो स‍ाबित किया ही इसके साथ साथ वैश्विक गायक के रूप में अपनी पहचान बनाई। फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार पाने वाले वह पहले पुरूष गायक था। ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना के गीत गा के भरोसे आज भी उनके प्रशंसक उनकी राह देख रहे है। पर जाने वाले कभी लौट कर नही आते किन्‍तु यादें जरूर हमारे बीच रह जाती है।

Aug 23, 2009

भाजपा का दर्द - जिन्‍ना से जसवंत तक

भारतीय जनता पार्टी में आम चुनाव में हार के बाद जिस प्रकार का कलह मजा है, इसके दूरगामी परिणाम दिखाई पड़ते दिख रहे है। 1998 तक देश की सबसे अनुशासित प‍ार्टियों में गिनी जाने वाली भाजपा आज अपने अ‍तीत को भूल कर कांग्रेसी पथ पर चलने को अग्रसर दिखाई पड़ती है। सात साल के केन्‍द्रीय सत्‍ता सुख के काल में भाजपा के नेता कार्यकर्ताओं से विमुख हो चुके थे, उनके दम्‍भ था कि अटल के भरोसे पर कोई भी चुनाव जीता जा सकता है, मगर जो होना था उसका परिणाम हमारे समाने है। अटल के काल मे ही भाजपा सत्‍ता के सिंहासन से घूल चाटती हुई, पराभाव के रसातल में पहुँच गई।
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जसवंत सिंह

आडवानी भी जिन्‍ना का गुणगान कर चुके थे और अब जसवंत ने भी किया, दोनो के गुणगान मे बहुत बड़ा अंतर है। आडवानी ने जो किया मै उस पर जाना नही चाहूँगा किन्‍तु जसवंत पर जरूर कहना चाहूँगा। जिस व्‍यक्ति ने भाजपा निर्माण से लेकर आज तक अपना जीवन अपनी पार्टी को दिया आज वही पार्टी उन्‍हे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया, और कारण सरदार पटेल पर टिप्‍पणी को बताया जा रहा है। जसवंत सिंह को पार्टी से निकालना भाजपा की सबसे बड़ी राजनैतिक भूलो में से एक होगी। अपनी लिखी पुस्‍तक सरदार पटेल पर टिप्‍पणी दुर्भाग्‍य पूर्ण है किन्‍तु अनुचित नही है। देश की अखंडता में जिनता योगदान सरदार पटेल का रहा है उसे कोई भी भूला नही सकता किन्‍तु यह भी भूला दिया जाना कि गलत होगा कि सरदार पटेल भी हमेंशा गांधी के हाथ की कठ‍पुतली साबित हुये है। एक बड़ा जनमानस चाहे वह हिन्दू रहा होगा या मुसलमान विभाजन के पक्ष में नही था किन्‍तु नेहरू-गांधी पदलिप्‍सा के आगे पूरा देश लाचार रहा और विभाजन की भीषण विभीषिका से जूझता रहा।
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मुरझाता कमल

आज यह शोध का विषय होना चाहिये कि क्‍या भारत विभाजन रोका जा सकता था ? मेरी नज़र में इसका उत्‍तर हाँ में आयेगा क्‍योकि आज देश में जितने मुसलमान है उतने आज पाकिस्‍तान में भी नही है। जब आज मुस्लिम स्‍वतंत्रता पूर्वक रह सकते है तो तब भी रह सकते थे किन्‍तु नेहरू के मोह में गांधी जी के आँखो में पट्टी सी बांध दी थी। नेहरू के अतिरक्ति कोई भी ऐसा भारतीय नेता इस हैसियत में नही था कि व गांधी जी के गलत बातों का विरोध कर सकें, यहाँ तक कि सरदार पटेल भी नही। देश के साथ साथ काग्रेस का एक बड़ा जनमानस खुद सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनने की इच्‍छा रखता था किन्‍तु नेहरू और गांधी के प्रभाव में जो वस्‍तु स्थिति हमारे समाने आयी उससे हम भली भाति परिचित है, कि देश कि इच्‍छा के विरूद्ध हमने नेहरू के रूप में देश का पहला प्रधानमंत्री पाया।
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जिन्‍ना और गांधी
यह भूलना गुनाह होगा कि गांधी जी ने नेहरू के राजनैतिक कैरियर बनाने के लिये सुभाष चंद्र बोस के साथ क्‍या-क्‍या नही किया ? काग्रेस समिति के पूर्ण बहुतमत के फैसले का विरोध करते है गांधी ने सुभाष बावू को अध्‍यक्ष पद के चुनाव में हराने के लिये क्‍या क्‍या नही किया। गांधी जी उस हद तक गिरे जिस हद तक उन्‍हे ने जाना चाहिये था, पटेल, टंडन सहित अनेको नेताओं को चुप कराने के लिये उन्‍होने नेताजी की जीत को आपनी हार बताने लगे।
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नेहरू, गांधी व पटेल
आज जरूरत है कि देश के विभाजन की सही विभिषिका देश के समाने रखी जाये, वही जसवंत सिंह ने रखने का प्रयास किया था। भारत विभाजन के लिये जिन्‍ना से ज्‍यादा दोषी नेहरू, गांधी और कांग्रेस पार्टी है जो जो मुस्लिमो को साथ नही रख सकें, आज यही काग्रेस पार्टी मुस्लिमों को की सबसे बड़ी हितैसी बनी हुई है। गेहू के साथ सदैव घुन पीसा जाता है, नेहरू और गांधी के पापों के छिट्टे पटेल पर पड़ना स्‍वाभाविक ही था।
http://timesofindia.indiatimes.com/photo.cms?photoid=3358021
गांधी और सुभाष

जसवंत सिंह कि किताब पर जो रवैवा भाजपा का है वह र्दुभाग्‍य पूर्ण है, वह एक लेखक की किताब को अपने विचारधारा से तुलना कर रही है और किताब के लेखक के विचारों को अपनी विचारधारा से जोड़ रही है। भाजपा के अंदर की इस कुस्‍ती को असली मजा देश विभाजन की दोषी काग्रेस ले रही है।

चित्र इन्‍टर नेट के विभिन्‍न सूत्रों से साभार

Aug 20, 2009

कानपुर की यात्रा और यादें

कानपुर का अपना ही महत्‍व है, कानपुर भुलाये नही भूलता, कैसे भूलेगा बचपन के 5-6 साल जो वहाँ बीते थे। 18 अगस्‍त को व्‍यक्तिगत काम से कानपुर जाना हुआ। 1994 के बाद कानपुर को नजदीक से देखने का यह पहला मौका था। 2007 में अनूप जी से मिलना हुआ था किन्‍तु वह एक भागम-भाग यात्रा थी, भागमभाग तो इस बार की थी किन्‍तु कानपुर छाप नही छूटी।

कानपुर सेन्‍ट्रल पर उतर कर हम रिक्शा लेकर नवीन मार्केट पर पहुँचे, रास्‍ते में एक थाना था अब नाम याद नही शायद कार्नल गंज रहा होगा। उस पर बड़े बड़े शब्‍दो में लिखा था दलालो का प्रवेश वर्जित है वाकई यह एक हास्‍यस्‍पद बात ही लगी, कोई दलाली करने आये बंद कर दो थाने में और दिला दो याद छठी के दूध का पर नही भारतीय पुलिस है, ऐसे थोड़े ही काम करेगी।

नवीन मार्केट में भारतीय मजदूर संघ के प्रदेशिक कार्यालय पर कुछ देर का विश्राम किया, जो भी कार्यालय पर अधिकारी नेता व पिताजी का पुराना परिचित मिला भैया जी को तो पहचान लिया किन्‍तु मुझे पहचाना नही पाया। शायद यह लम्‍बे अंतराल के कारण था। 16-17 साल पहले जिस कार्यलय में बचपन के कुछ छण व्‍य‍तीत किये वहाँ फिर से पहुँच कर बहुत अच्‍छा अनुभव रहा।

अच्‍छा अनुभव काफी देर बरकरार नही रहा, चौराहे पर एक आदमी और भीड़ के मध्‍य विवाद से रूबरू होना पड़ा, करीब आधा दर्जन लोग एक 35-45 वर्ष के अधेड़ को मारे जा रही थी। सुनने में आया कि छेड़खानी का मामला था। वाकई कितना विपरीत समय आ गया है कि 45 साल तक की उम्र पहुँचने के बाद छेड़खानी करने की आदत नही गई।

हम कल्‍यानपुर पहुँचने के लिये आटो पर बैठ गये और कानपुर विश्वविद्यालय पहुँचे, रास्‍ते के नज़ारे देखने लायक थे, चौड़ी सड़के और सड़को के किनारे हुये विकास और बदलाव अच्‍छी अनुभूति दे रहे थे। कानपुर विश्वविद्यालय पहुँच कर विभिन्‍न अधिकारियो से मिलना हुआ। करीब ढ़ाई-तीन बजे सोचा कि अनूप जी से मिला जा सकता है, नम्‍बर तो था नही सिद्धार्थ जी से उनका नम्‍बर प्राप्‍त हुआ और पता चला कि उनकी ब्‍लाग अधारित पुस्‍तक 30 अगस्‍त को हमारे बीच ला रहे है। अनूप जी से बात हुयी और समय की परिस्‍थति के अनुसार मिल न पाने खेद जाहिर कर कानपुर छोड़ने की अनुमति चाही। उस समय 4.30 के आस-पास हुये थे इलाहाबाद के लिये चौरी-चौरा 5.30 पर कानपुर सेन्‍ट्रल पर तैयार खड़ी रहती है। मेरी बात को सुनते हुये न मिल पाने पर अनूप जी ने खेद जाहिर किया और कहा कि मै 30 को सम्‍भवत: इलाहाबाद आ ही रहा हूँ, और वही बैठकी हो जायेगी।

कानपुर यात्रा का अभी सबसे महत्‍वपूर्ण और रोमांचक सिरा बाकी था, कानपुर विवि पर आटो मिल गया था, गाड़ी ऐसे चला रहा था कि जैसे सनी पाजी गदर में ट्रक चला रहे थे। आटो ऐसा चला रहा था लग रहा था कि भगवान अब बुला ले कि तब, सभी की सांसे अटकी हुई थी। घंटाघर से 200 मीटर पहले ही आटो रोकर उसने का कि हे भगवान गाड़ी में गैस खत्‍म हो गई अब क्‍या करें? और हम लोगो से करबद्ध निवेदन किया कि आप लोग पैदल चले जाये स्‍टेशन थोड़ी दूर ही पर है, मुझे और आटो पर बैठे दो चार और आदमियों को दया आ रही थी और हम उतरने को तैयार थे, तभी आटो में बैठी गम्‍भीर और उम्‍मीद से ज्‍याद मोटी और भारी महिला ने विरोध किया, तुम आटो धक्‍का देकर पहुँचाओं मै नही उतरू‍गीं, उसके सुर में सुर मिलाने वालो की संख्‍या बड़ गई, और उस ड्राईवर से कहा जाने लगा कि तुम सबसे 2-2 रूपये कम लो हम उतर जायेगे या कोई और गाड़ी पर हमें बैठाओं हम पैसा उसी को देंगे और तुम उससे हिसाब करना, तरह तरह की बाते सुन कर वो गाड़ी वाला खीज पड़ा और कहा आप लोग नही उतरेगे, नही उतरेगे और नही उतरेगे कहा हुआ आटो स्‍टार्ट किया और पागलो की तरह बड़बड़ता हुआ कि भलाई का जमाना ही नही रह गया है, रिक्‍वेस्‍ट कर रहा था पर किसी को सुनाई नही देता, महिला बोली बोल गैस कहाँ से आ गई ? यह सुनते ही वह और पागल टाईप का हो गया और हल्‍की गति में जा कर एक रिक्‍शे वाले से भिड़ गया, हमने उसे पैसा दिया और उसका तमाशा अभी जारी था।

चौरी-चौरा स्‍टेशन पर खडी थी अगर उस पागल आदमी का स्‍टंट इसी प्रकार चलता रहता था हमारी ट्रेन पूरी तरह से छूटने को तैयार थी।

Aug 14, 2009

मुस्लिम महिलओं का दर्द

जो बात श्री गिरीश जी ने खत्‍म की थी वहीं से मै शुरूवात मै उसी के आगे से करना चाहूँगा। बहुत से लोग ऐसे होते है, जो हिन्‍दु धर्म और संस्‍कृति को गाली देने में आपना बड़प्‍पन समझते है। उनकी यह समझ उतनी ही सही हो सकती है जितनी की गर्म तावे पर पड़ने वाली बूँद के अस्तित्‍व इतनी ही।

यहाँ मेरा किसी धर्म का विरोध प्रस्‍तुत करना नही है बस उतना ही प्रस्‍तुत करना चाहूँगा जितना कि सच है। इस्‍लाम मे महिलाओं की स्थिति क्‍या है किसी से छिपी नही है किसी को बताने की जरूरत भी नही है। शाहवानो से लेकर तस्‍लीमा तक सभी इस्‍लाम में आपकी स्थिति को बयां कर रही है। किसी को महिला को आपने शौहर के सम्पत्ति में जगह नही मिल पा रही है तो कोई महिला कठमुल्‍लाओं से आपने अबरू और प्राण की रक्षा के लिये जूझ रही है। इस्‍लाम में नारी की आबरू को नंगा करने में कोई कसर नही छोड़ी जा रही है, कुछ कठमुल्ले नारी के पति को उनकी औलाद तो कभी उसके स्‍वसुर को उसका पति घोषित कर देता है।

इस्‍लाम की वर्जनाएं समाप्‍त नही होती है हम महिलाओं के प्रति अत्‍याचार निम्‍न रूप में देख सकते है-

पैगंबर मोहम्मद ने कहा था की यदि नमाज़ पढ़ते समय आपके सामने से गधा, कुत्ता या औरत निकले तो नमाज़ हराम है। दो औरतों की गवाही एक पुरुष की गवाही के बराबर है. नरक में 95 प्रतिशत महिलाएं हैं।

एक मुस्लिम महिला की जुब़ानी उसी की कहानी - हादिया के बयान और हक़ीकत बिल्कुल बरअक्स हैं. इस्लाम में औरतों की हालत किसी मुस्लिम लड़की के बाप या भाई से पूछो। हमारी ज़िंदगी से तो मौत अच्छी. हर बात पर हमारी औकात बता दी जाती है. मेरा भाई एक ईसाई लड़की से शादी करना चाहता था, वो एक बार मुझसे बाहर मिली और जब मैने उसे अपने तौर तरीके बताए तो उसके चेहरे का रंग उतर गया. उसके मां बाप ने इसके बाद मेरे भाईजान को अपने घर बुलाकर बात चीत की। मुझे पता चला कि मेरा भाई उनके सवालों का कोई जवाब नहीं दे सका। उस दिन के बाद वो मेरे भाई से दुबारा नहीं मिली. मेरा भाई, मेरे अब्बा से बहुत ज़्यादा उखड़ चुका है. अब ये हाल है कि मेरा भाई जो पाँच वक़्त का नमाज़ी था, मज़हब के नाम से ही चिढ़ने लगा है. बड़ी बात नहीं अगर मुझे पता चले कि उसने अपना मज़हब बदल लिया है। सच पूछो तो मुझे अपने भाई से बहुत हमदर्दी है मगर मुस्लिम लड़कियों की ज़िंदगी अख़बार मे छपने वाली बातें नहीं हक़ीकत होती है, जो ना तो रंगीन है और ना ही सपनीली।

एक और महिला कहती है
- बहुत बहुत शुक्रिया आप सब का. जब किसी औरत ने अपने उपर हुए ज़ुल्म की वजह से कराहने की जुर्रत की तो सभी लगे मशविरे देने. खुदा करे आप सब एक बार ज़रूर औरत की ज़ात में पैदा हों. तब दर्द का अहसास होगा.मु‍स्लिम धर्म में महिलाओं पर ज्‍यातियॉं स्‍वयं ही धर्म बन चुकी है, आज यह स्थिति है कि एक महिला को मुस्लिम हो सिर्फ कुछ लोगो की जा‍गीर मात्र बन कर रह गई है।

अद‍िति


पता नही कैसे पोस्‍ट हो गया ????


Aug 1, 2009

शह‍ीदी दिवस पर उधम सिंह को नमन

आज शहीद उधम सिंह का शहीदी दिवस है। शहीद उधम सिंह चंद्रशेखर आजाद राजगुरु सुखदेव और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुक्मरान को ऐसी चोट दी, जिसके निशान यूनियन जैक पर दशकों तक नजर आए। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में 13 अप्रैल 1919 का दिन आंसुओं से लिखा गया है जब अंग्रेजों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा कर रहे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। उधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लेने का प्रण लिया। इन्‍हे अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। 4जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। आज भारत की ऐसी दशा है, कि नेहरू गांधी के मरघटों को देवालय की तरह पूजा जाता है और उधम सिंह जैसे वीर सपूतो को याद करने के लिये वक्‍त भी नही मिलता। अमर शहीद उधम सिंह नमन ।