आज के दिन के साथ प्रमेन्द्र प्रताप सिंह के नाम के साथ अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय भी जुड़ गया। रविवार 25 जुलाई 2010 को उत्तर प्रदेश विधिज्ञ परिषद मे अधिवक्ता के रूप मे पंजीयन हो गया है।
बहुत से कम ही लोगो के फर्म को ऐसे अधिवक्ताओं ने प्रमाणित किया होगा जिन्हाने उम्र के 7 दशक देखे होगे किन्तु मेरे लिये सौभाग्य की बात यह रही कि मेरा चरित्र उस व्यक्तित्व ने प्रमाणित किया जिन्होने 7 दशक इस विधि व्यवसाय को दिया है। ऐसे विधि विद्वान उत्तर प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी, वरिष्ठ अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने किया, जिनका खुद का पंजीयन सन 1942 का है।
कोशिश ही नही पूर्ण निष्ठा होगी कि अच्छा करूँ.... जय हिन्द, भारत माता की जय, जय श्रीराम
Jul 25, 2010
Jul 24, 2010
एक सुबह दिल्ली के नाम
वर्ष 2007 के बाद 18 जुलाई को पुन: अपने मित्र के साथ दिल्ली पहुँचना हुआ। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से अपने मित्र के फ्लैट पहाड़ंगज से पैदल ही निकल दिये, दूरी 1 किसी से भी कम थी तो किसी प्रकार की सवारी करना मूर्खता ही होगी साथ ही साथ जब पैदल चलना हो तो आस-पास की दर्शनीयता बढ़ जाती है।
मित्र के यहाँ फ्रेस हुये नहाये धोये और आराम किये। फिर अपने बहुत पुराने सहपाठी से यहाँ निकल दिये, मुझे उस जगह का नाम तो नही मालूँम पर पहाड़गंज से उस स्थान का किराया15 रूपये लगा था, मतलब दूरी पर्याप्त थी, इडिया गेट भी देखा इसी रास्ते पर तो सीबीएसई का दफ्तर भी तो और तो और दिल्ली नगर निगम का आफिस भी, आखिर जब उस मित्र के पास भी पहुँच गया जिससे मै अन्तिम बार कक्षा-8 मे मिला था, हमारी बहुत पटती थी, उसी माता जी भी मुझे देखते पहचान गई, वकाई उस परिवार मे बैठ कर बहुत सुखद महसूस कर रहा था।
हम लोग शाम को ही एक बहुत ही अच्छे मंदिर मे भी गये और काफी देर वहाँ से सुखद वातावरण का आनंद लिया। चूकि कैमरा दोस्त तो फोटो नही ले सके। शाम को जम्मू के लिये ट्रेन थी तो मेट्रो मे घूमते घामते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चल दिये।
मित्र के यहाँ फ्रेस हुये नहाये धोये और आराम किये। फिर अपने बहुत पुराने सहपाठी से यहाँ निकल दिये, मुझे उस जगह का नाम तो नही मालूँम पर पहाड़गंज से उस स्थान का किराया15 रूपये लगा था, मतलब दूरी पर्याप्त थी, इडिया गेट भी देखा इसी रास्ते पर तो सीबीएसई का दफ्तर भी तो और तो और दिल्ली नगर निगम का आफिस भी, आखिर जब उस मित्र के पास भी पहुँच गया जिससे मै अन्तिम बार कक्षा-8 मे मिला था, हमारी बहुत पटती थी, उसी माता जी भी मुझे देखते पहचान गई, वकाई उस परिवार मे बैठ कर बहुत सुखद महसूस कर रहा था।
हम लोग शाम को ही एक बहुत ही अच्छे मंदिर मे भी गये और काफी देर वहाँ से सुखद वातावरण का आनंद लिया। चूकि कैमरा दोस्त तो फोटो नही ले सके। शाम को जम्मू के लिये ट्रेन थी तो मेट्रो मे घूमते घामते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चल दिये।
Jul 13, 2010
राजनीति मे खून का खेल
आखिरकार इलाहाबाद की राजनैतिक गलियों पर फिर खून खराबा हो गया है। मुट्ठीगंज मोहल्ले मे मंत्री नंद गोपाल गुप्ता के आवास के सामने ही बम से प्राणघातक हमला किया गया। जिसमे मंत्री गम्भीर रूप से घायल हुये और उनका एक अंगरक्षक की मृत्युकारित हुआ। ठीक इसी प्रकार कुछ साल पहले बसपा विधायक राजूपाल की हत्या करवा दी गई थी जिसका आरोप सत्ताधारी पार्टी पर लगाया गया था और आज खुद बसपा सत्ताधारी पार्टी है।
समाजसेवा का चोला पहन कर उतरे राजनैतिक लोग क्यो अपने ही सफेदपोशधारियों की जान के पीछे पड़ जाते है ? आखिर समाजसेवा के नाम पर उनका असली मकसद क्या होता है यह आज तक समझ से परे है। राजनीति मे आने के बाद लोगो के पास पता नही कौन सा कुबेर का खजाना लग जाता है कि वो कुछ ही दिन मे सड़क के व्यापारी से अरबपतियों में सुमार हो जाते है। राजनीति की चादर को मैला करने मे ऐसे लोगो की भूमिका काफी महत्पूर्ण हो जाती है।
समाजसेवा के नाम पर खून का खेल समझ से परे है, आखिर कब तक इस प्रकार किसी का बेटा, भाई, पति, पिता को छीना जाता रहेगा ? जो अंगरक्षक मरा है क्या सरकारी मदद उसकी कमी को पूरा कर पायेगी? कुछ बाते हमेशा दिल का झकझोर देती है। आखिर हम कहाँ खड़े है ?
समाजसेवा का चोला पहन कर उतरे राजनैतिक लोग क्यो अपने ही सफेदपोशधारियों की जान के पीछे पड़ जाते है ? आखिर समाजसेवा के नाम पर उनका असली मकसद क्या होता है यह आज तक समझ से परे है। राजनीति मे आने के बाद लोगो के पास पता नही कौन सा कुबेर का खजाना लग जाता है कि वो कुछ ही दिन मे सड़क के व्यापारी से अरबपतियों में सुमार हो जाते है। राजनीति की चादर को मैला करने मे ऐसे लोगो की भूमिका काफी महत्पूर्ण हो जाती है।
समाजसेवा के नाम पर खून का खेल समझ से परे है, आखिर कब तक इस प्रकार किसी का बेटा, भाई, पति, पिता को छीना जाता रहेगा ? जो अंगरक्षक मरा है क्या सरकारी मदद उसकी कमी को पूरा कर पायेगी? कुछ बाते हमेशा दिल का झकझोर देती है। आखिर हम कहाँ खड़े है ?
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Jul 10, 2010
कानपुर की दास्तान
कानपुर जाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, हमेशा दिल करता है कि काश कानपुर छूटा होता है! विधि स्नातक हो गया हूँ। इस समय विधि लॉ ग्रेजुएट होने के बाद मुझे निरंतर कानपुर के सम्पर्क मे रहना पड़ रहा है। ऐसा कोई महीना नही होता है कि मुझे कानपुर न जाना पड़ रहा है और रिजर्ल्ट के बाद तो अब कुछ दिनो लगातार आना जाना लगा ही रहेगा। जब भी मै कानपुर गया हूँ चाहे अनूप शुक्ल "फुरसतिया"जी से व्यक्तिगत मुलाकात हुई हो या न हुई हो मै कानपुर पहुँच कर मोबाइल टॉक जरूर कर लेता हूँ।
कल कानपुर अकेले गया था, कल्याणपुर में कानपुर विश्वविद्यालय मे अपना काम करवाते हुये मुझे 3 बज गये थे, मेरा मानना है कि परिवार और दोस्त किसी भी व्यक्ति का अहम हिस्सा होते है। ऐसे ही कानपुर के हमारे एक अधिवक्ता मित्र भाई दुर्गेश सिंह लगातार हमारी खैरियत पूछ रहे थे, भोजन किया कि नही, जल्दी कर जो, जल्दी काम करके घर आ जाओ, इस प्रकार का अपनापन बहुत अच्छा लग रहा था। कानपुर विश्वविद्यालय से काम करवाने के बाद मै दुर्गेश जी के पास गया तो वे पहुँचते ही, खाने पानी के बंदोबस्त मे लग गये। समय के बाद भूख खत्म हो जाती है किन्तु सामने आये खाने का अनादर भी नही करता चाहिये, भोजन हुआ और बहुत सी ढ़ेर सारी बाते तो शाम हो गयी तो नौबस्ता का एरिया भी घुमने निकल दिये, टहल कर लौटा तो सीधे बिस्तर ही नज़र आया।
सुबह जल्दी उठने की आदत के कारण 5 बजे उठ गया था, और सुबह उठ कर एरिया मे घूम भी लिया था, कल शाम मुझें याद था कि नौबस्ता जाते समय बारादेवी (बाराह देवी मंदिर) का मुहल्ला पड़ा था, जहाँ मम्मी जी के साथ सब्जी आदि लेने आते थे। तो सुबह मन कर गया क्यो न अपने पुराने घर पर भी हो लिया जाये, जहाँ मैने अपने बचपन के 6-7 साल गुजारें थे। इसी लिये मै मित्र दुर्गेश के घर से भी 6 बजे निकल लिया था ताकि अपने घर की ओर भी जा सकूँ, बारादेवी से ट्रंसपोर्ट नगर पहुँचा वहाँ से अपने घर के मोहल्ले ढकना पुरवा भी पूछते पूछते पहुँच गया।
मोहल्ला ढकना पुरवा मे इतना बदलाव हो चुका है कि कुछ भी पहिचान पाने की स्थिति मे मै न ही था। एक बुर्जग मिले तो मैने अपने घर के पास के स्थिति भैरव बाबा के पार्क के बारे मे पूछा तो मुझे विपरीत दिशा मे दिखाने लगे जिधर मै आशा करता था कि मेरा घर उधर है। फिर मैने अपने पिताजी का नाम बता कर पूछा कि मुझे उनके घर जाना है तो मुझे क्लाइंट जान कर यह बताने लगे कि अब सब इलाहाबाद मे रहते है और वहाँ का रटाराटाया पता देने लगे, फिर मैने जोर देकर कहा कि मै श्री भूपेन्द्र नाथ सिंह का लड़का हूँ और मै अपने घर जाना चाहता था। जैसे उनको पता चला कि मै उनका लड़का हूँ वो वह व्यक्ति बोला कि बबुआ तुम उनके लड़के हो, जब तुम इयां से गयेन रहेव तो बहुत छोटे छोटे रहेव यह कहने हुये वह व्यक्ति अपना काम छोड़कर मुझे घर तक छोड़ने आया।
जैसे उस व्यक्ति ने वहाँ एक दो लोगो को बताया कि देखो भाईजी के लड़के आये है तों आस पास की लोगो की भीड़ ही लग गई। मानो मै कोई लॉटरी का नम्बर लेकर बैठा हूँ और सब अपना नम्बर देखने को उतावले हो, जब मैने 1993 मे कानपुर छोड़ा था तो लॉटरी का व्यवासाय चरम पर होता था और लॉटरी का नम्बर देखने को बहुत भीड़ लगती थी। हर मुँह से एक ही बात बेटवा हमका पहिचानेव, सभी चेहरे पर 17 साल बाद की सिकन आ चुकी थी किन्तु कोई भी पुराना चेहरा अंजाना नही था। सब को फला की आम्मा और फला के पापा कह कर मै पहचान रहा था। क्योकि मेरी यादें भी धुधली हो चुकी थी।
मेरे पड़ोस मे एक नाऊन रहती हैनाम तो मै नही जानता हूँ किन्तु उन्हे बचपर मे मोलमल कहता था, करीब 75 साल की, वह बहुत अच्छी महिला है एक हाथ मे फालिस मार गया मै उसकी स्थिति देख कर अपने को अपने का रोक नही पाया और 17 साल पुरानी यादों को लेकर गले लिपट कर रो पड़ा, उनकी एक ही बाद दिल का लग गई कि कहाँ रहेन इतने दिन कर आज दादी के याद आईन है। 17 साल बाद भी वही अपनत्व पा कर दिल खुश हो रहा था। उन गलियों मे भी गया जहाँ चोर सिपाही खेला करता था, रेलवे का टुनटुनिया पाटक भी देखने गया तो बंद होने समय टुनटुन की आवाज करता था।
चाय-पानी हुआ, फिर सभी ने खाने पर जोर दिया किन्तु भूख न होने के कारण मैने खाने से मना कर दिया। सबने बहुत रोकने की कोशिश की बेटवा आज रात यहीन रूक जाओ मैने यह कह कर कि जल्द फिर आऊँगा, तो फिर सब माने, मोहल्ले की बुर्जुग महिलाये एक ही बात कह रही थी बेटवा एक बार अम्मा (मेरी मम्मी) से मिलवाय देव, देखे बहुत दिन होई गये है पता नही कब जिंदगी रहे कि न रहे, वाकई 17 साल बहुत होते है। फिर मोहल्ले के एक भइया के मित्र मुझे कानपुर सेट्रल पर छोडने भी आयेए बहुत कुछ बदल गया था किन्तु न बदला तो लोगो का प्यार और अपनत्व।
कल कानपुर अकेले गया था, कल्याणपुर में कानपुर विश्वविद्यालय मे अपना काम करवाते हुये मुझे 3 बज गये थे, मेरा मानना है कि परिवार और दोस्त किसी भी व्यक्ति का अहम हिस्सा होते है। ऐसे ही कानपुर के हमारे एक अधिवक्ता मित्र भाई दुर्गेश सिंह लगातार हमारी खैरियत पूछ रहे थे, भोजन किया कि नही, जल्दी कर जो, जल्दी काम करके घर आ जाओ, इस प्रकार का अपनापन बहुत अच्छा लग रहा था। कानपुर विश्वविद्यालय से काम करवाने के बाद मै दुर्गेश जी के पास गया तो वे पहुँचते ही, खाने पानी के बंदोबस्त मे लग गये। समय के बाद भूख खत्म हो जाती है किन्तु सामने आये खाने का अनादर भी नही करता चाहिये, भोजन हुआ और बहुत सी ढ़ेर सारी बाते तो शाम हो गयी तो नौबस्ता का एरिया भी घुमने निकल दिये, टहल कर लौटा तो सीधे बिस्तर ही नज़र आया।
सुबह जल्दी उठने की आदत के कारण 5 बजे उठ गया था, और सुबह उठ कर एरिया मे घूम भी लिया था, कल शाम मुझें याद था कि नौबस्ता जाते समय बारादेवी (बाराह देवी मंदिर) का मुहल्ला पड़ा था, जहाँ मम्मी जी के साथ सब्जी आदि लेने आते थे। तो सुबह मन कर गया क्यो न अपने पुराने घर पर भी हो लिया जाये, जहाँ मैने अपने बचपन के 6-7 साल गुजारें थे। इसी लिये मै मित्र दुर्गेश के घर से भी 6 बजे निकल लिया था ताकि अपने घर की ओर भी जा सकूँ, बारादेवी से ट्रंसपोर्ट नगर पहुँचा वहाँ से अपने घर के मोहल्ले ढकना पुरवा भी पूछते पूछते पहुँच गया।
मोहल्ला ढकना पुरवा मे इतना बदलाव हो चुका है कि कुछ भी पहिचान पाने की स्थिति मे मै न ही था। एक बुर्जग मिले तो मैने अपने घर के पास के स्थिति भैरव बाबा के पार्क के बारे मे पूछा तो मुझे विपरीत दिशा मे दिखाने लगे जिधर मै आशा करता था कि मेरा घर उधर है। फिर मैने अपने पिताजी का नाम बता कर पूछा कि मुझे उनके घर जाना है तो मुझे क्लाइंट जान कर यह बताने लगे कि अब सब इलाहाबाद मे रहते है और वहाँ का रटाराटाया पता देने लगे, फिर मैने जोर देकर कहा कि मै श्री भूपेन्द्र नाथ सिंह का लड़का हूँ और मै अपने घर जाना चाहता था। जैसे उनको पता चला कि मै उनका लड़का हूँ वो वह व्यक्ति बोला कि बबुआ तुम उनके लड़के हो, जब तुम इयां से गयेन रहेव तो बहुत छोटे छोटे रहेव यह कहने हुये वह व्यक्ति अपना काम छोड़कर मुझे घर तक छोड़ने आया।
जैसे उस व्यक्ति ने वहाँ एक दो लोगो को बताया कि देखो भाईजी के लड़के आये है तों आस पास की लोगो की भीड़ ही लग गई। मानो मै कोई लॉटरी का नम्बर लेकर बैठा हूँ और सब अपना नम्बर देखने को उतावले हो, जब मैने 1993 मे कानपुर छोड़ा था तो लॉटरी का व्यवासाय चरम पर होता था और लॉटरी का नम्बर देखने को बहुत भीड़ लगती थी। हर मुँह से एक ही बात बेटवा हमका पहिचानेव, सभी चेहरे पर 17 साल बाद की सिकन आ चुकी थी किन्तु कोई भी पुराना चेहरा अंजाना नही था। सब को फला की आम्मा और फला के पापा कह कर मै पहचान रहा था। क्योकि मेरी यादें भी धुधली हो चुकी थी।
मेरे पड़ोस मे एक नाऊन रहती हैनाम तो मै नही जानता हूँ किन्तु उन्हे बचपर मे मोलमल कहता था, करीब 75 साल की, वह बहुत अच्छी महिला है एक हाथ मे फालिस मार गया मै उसकी स्थिति देख कर अपने को अपने का रोक नही पाया और 17 साल पुरानी यादों को लेकर गले लिपट कर रो पड़ा, उनकी एक ही बाद दिल का लग गई कि कहाँ रहेन इतने दिन कर आज दादी के याद आईन है। 17 साल बाद भी वही अपनत्व पा कर दिल खुश हो रहा था। उन गलियों मे भी गया जहाँ चोर सिपाही खेला करता था, रेलवे का टुनटुनिया पाटक भी देखने गया तो बंद होने समय टुनटुन की आवाज करता था।
चाय-पानी हुआ, फिर सभी ने खाने पर जोर दिया किन्तु भूख न होने के कारण मैने खाने से मना कर दिया। सबने बहुत रोकने की कोशिश की बेटवा आज रात यहीन रूक जाओ मैने यह कह कर कि जल्द फिर आऊँगा, तो फिर सब माने, मोहल्ले की बुर्जुग महिलाये एक ही बात कह रही थी बेटवा एक बार अम्मा (मेरी मम्मी) से मिलवाय देव, देखे बहुत दिन होई गये है पता नही कब जिंदगी रहे कि न रहे, वाकई 17 साल बहुत होते है। फिर मोहल्ले के एक भइया के मित्र मुझे कानपुर सेट्रल पर छोडने भी आयेए बहुत कुछ बदल गया था किन्तु न बदला तो लोगो का प्यार और अपनत्व।
Jul 8, 2010
विवाहोपरांत ब्लागर मीट
चिट्ठाकार राम चन्द्र मिश्र जी का विवाहोपरान्त आशीर्वाद कार्यक्रम दिनॉंक 7/7/2010 को सम्पन्न हुआ। रामचन्द्र जी ने इस कार्यक्रम को इलाहाबाद के ब्लागरों लिये ब्लागर मीट संज्ञा दी थी। ब्लागर मीट का समय 8.30 पर रखा गया था, स्थान भी रोटरी क्लब का परिसर था।
इलाहाबाद के ब्लागरों मे सर्वश्री कृष्ण मोहन मिश्र जी, हिमांशु पांडेय जी, वीनस केसरी जी तथा महाशक्ति समूह की ओर से विशाल मिश्र और सौरभ और मै स्वयं उपस्थित था। रात्रि 9 बजे तक सभी ब्लागर एक्कठे हो चुके थे और ब्लागर मीट भी प्रारम्भ हो चुकी थी, मुखिया राचन्द्र मिश्र सपत्निक का इंतजार हो रहा था जैसे ही युगल मंच पर विराजमान हुये तो समस्त ब्लागरों ने मिश्र दम्पत्ति को बधाई दी और फोटो खिचवाया।

रामचन्द्र जी से भेंट मिलन के बाद चर्चाओं का महौल गर्म हो चुका था, सभी ब्लागर बन्धु ईट-मीट मे व्यस्त थे, रात्रि के 11.15 का हो गये पता ही नही चला और 11.30 पर रामचन्द्र जी को बधाई और धन्यवाद दे कर हम अपने अपने गन्तव्य को प्रस्थान कर लिये।
इलाहाबाद के ब्लागरों मे सर्वश्री कृष्ण मोहन मिश्र जी, हिमांशु पांडेय जी, वीनस केसरी जी तथा महाशक्ति समूह की ओर से विशाल मिश्र और सौरभ और मै स्वयं उपस्थित था। रात्रि 9 बजे तक सभी ब्लागर एक्कठे हो चुके थे और ब्लागर मीट भी प्रारम्भ हो चुकी थी, मुखिया राचन्द्र मिश्र सपत्निक का इंतजार हो रहा था जैसे ही युगल मंच पर विराजमान हुये तो समस्त ब्लागरों ने मिश्र दम्पत्ति को बधाई दी और फोटो खिचवाया।

रामचन्द्र जी से भेंट मिलन के बाद चर्चाओं का महौल गर्म हो चुका था, सभी ब्लागर बन्धु ईट-मीट मे व्यस्त थे, रात्रि के 11.15 का हो गये पता ही नही चला और 11.30 पर रामचन्द्र जी को बधाई और धन्यवाद दे कर हम अपने अपने गन्तव्य को प्रस्थान कर लिये।
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ब्लागर भेंटवार्ता
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Jul 6, 2010
राम चन्द्र मिश्र बंधे परिणय मे, ब्लागर मीट 7 जुलाई को
वर्ष 2006 से हिन्दी चिट्ठाकारी मे लगे चिट्ठकार श्री रामचन्द्र मिश्र जी वैवाहिक बंधन मे बंध गये, इसके लिये उन्हे बहुत बहुत बधाई। वैवाहिक बंधन मे बधने की खुशी में उन्होने 7 तारीख को ब्लागर मीट का आयोजन किया है, इलाहाबाद व उसके आस पास के ब्लागर बंधु इस मीट में हार्दिक आमंत्रित है।
Jul 1, 2010
क्या हम राष्ट्रमंडल खेलो के आयोजक है !!!

राष्ट्रमंडल खेलो को लेकर भारत सरकार ने जो तैयारियों का प्रदर्शन विश्व समुदाय से सम्मुख किया उसी का नतीजा है कि आई ओ सी के अध्यक्ष जैक्स रॉग्स ने भारतीय खेल आधिकारियों के मुँह पर तैयारियों के झूठ का गुब्बारा की हवा दो मिनट मे निकाल दी। जैक्स ने कड़े शब्दो मे ढ़ीली तैयारियों की अपत्ति आईओए अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी से कर चुके है। उन्होने साफ-साफ शब्दो मे कहा है कि आप खिलाडि़यो को दी जाने वाली मूलभूत सुविधाओ को भी अभी तक पूरा नही कर सके है। मुझे इस बात से याद आता है कि दो वर्ष पूर्व चीन की राजधानी बींजिंग मे होने वाली ओलम्पिक खेलो की तैयारी का जयाजा लेने वाले प्रतिनिधि मंडल ने चीन सरकार के काम पर आश्चर्यजनक ढ़ग से एक आग्रह किया कि आप कृपया करके कामो इतने तेजी से मत निपटाईये कि आपके द्वारा बनवाये गये स्टेडियम, खेल हॉल व अन्य खेल परिसर तत्कालीन समय पर पुराने लगने लगे। इस प्रकार दो विश्व के सबसे बड़े विकाससील राष्ट्रो के कार्य सम्पन्नता मे कितनी भिन्न देखी जा सकती है। एक ओर तो समय समय पूर्व काम खत्म हो जा रहा है जबकि दूसरी ओर खेल का आयोजन मुहाने पर खड़ा है और दूसरी तरह सरकार की हीला हवाली और लीपा पोती ही देखी जा रही है। इतने बड़े खेल का आयोजन हम 4 साल पूर्व हमें मिल चुका था किन्तु हमारी कुम्भकरणीय नींद तथा काम के प्रति तत्परता सबके सम्मुख है कि विदेश से आने वाले आधिकारी खरी खोटी सुनाकर चले जा रहे है। मुझे हंसी आती है कि जब हम 2016 के ओलम्पिक खेलो लिये अपनी दावेदारी भारत सरकार और सुरेश कलमाड़ी पेश कर रहे थे।
भारतीय सरकारी कार्य करने रवैया जग जाहिर है, जब तक कि बाराज दुआर पर आ न जाये तब तब दुल्हन की सजावट करने वाली परचारिकाऍं गायब रहती है। अब जब कि बारात रूपी खेलो के आयोजन का समय नजदीक आ चुका है तब इस काम को करने की अंधी दौड मे दिल्ली सरकार लोगो के जान जोखिम मे डाल कर कार्य पूर्ण करने का प्रयास किया जा रहा है। इसी का परिणाम है कि दिल्ली मेट्रो के विस्तार के समय अनेक बार बड़ी तथा अनगिनत छोटी-मोटी र्दुघटनाऍं कार्य के समय होती रही है और इसके परिणाम स्वरूप गरीब मजदूर अपनी जान गवां रहे है। इस अपाधापी मे बनने वाले मेट्रो के फ्लाईओवर व स्टेशन निर्माण की गुणवत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह उठ रहा है कि निर्माण के दौरान यह स्थिति है तो तब खेलो के दौरान आने वाली महाकुम्भी भीड़ को क्या होगा? गौरतलब है कि जिस कम्पनी के संरक्षण मे ढा़चा गिरा, क्रेन पलटी तथा मजूदूरो की मौत हुई उस कम्पनी को काली सूची मे डालने के बजाये मानो कार्य विस्तार देकर उसे र्दुघटना का पुरस्कार दिया जा रहा है।आज किसी भी खेलो के आयोजन मे सबसे बड़ी कमजोरी हमारी सुरक्षा व्यवस्था प्रतीत होती है, भले ही विश्व समुदाय के सम्मुख भारत के गृहमंत्री चिदम्बरम इंग्लैंड की बैडमिन्टन टीम के भारत दौरे को रद्द करने के जबावी कार्यवाही करत हुये बैडमिन्टन का मैच देखने के लिये दर्शन दीर्घा मे जा पहुँचे और मैच के बाद खीस निपोरते हुये वक्तव्य देते है कि इग्लैंड की बैडमिन्ट टीम को भारत का दौरा करना चाहिये था भारत का सुरक्षा तंत्र देखो कितना मजबूत है मै भी आम दर्शक बन कर मैंच देख रहा हूँ किन्तु यही चिदम्बरम यह भूल जात है कि आईपीएल 2009 के दौरान चुनाव के दौरान सुरक्षा न दे पाने का हवाला देते हुये आयोजन को आईपीएल के समय सीमा को 3 माह के लिये टालने की बात की थी किन्तु आईपीएल के आयोजको ने इसे स्थान्तरित कर दक्षिण आफ्रिका मे आयोजित करवाया, इससे तो विश्व समुदाय के समाने सुरक्षा को लेकर जो छवि गई वो आज भी देखने को मिल रही है और इसके साथ ही साथ भारतीय धन विदेश गया सो अलग। आईपीएल 2010 भी सरकार की गरिमा पर चार चॉद लगाया लेलंगाना मुद्दे पर आंध्रप्रदेश मे होने वाले मैचों को सुरक्षा के नाम पर नागपुर और मुम्बई मे ठेल दिया गया। जयपुर मे बम विस्फोट के कारण इंग्लैड क्रिकेट टीम ने 7 एक दिवासयीस मैचों की श्रृंखला को सुरक्षा का हवाला देते हुये 5 मैच खेल कर ही स्वदेश रवाना हो गई और भारतीय सुरक्षा व्यवस्था पर गृहमंत्री बयान पर विश्व समुदाय ताली बजाकर उनके बड़बोले पन का परिहास कर रहा था। यह तो केवल बानगी मात्र ही है किन्तु हालिया घटनओ ने भारत की सुरक्षा व्यावस्था को तार-तार कर दिया है जिस प्रकार छत्तीसगढ़ और बंगाल मे नक्सली और बिहार और झारखंड मे माओवादी अपना कहर बरपा रहे है उनके इन मंसूबे से राष्ट्रमंडले सुरक्षित नही प्रतीत हो रहो है कि कब ये तत्व दिल्ली पर हमला न हो।
तथ्यात्मक सहयोग विवेक मिश्र
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